Mati Manush Choon (Paper Back)

Format:Paper Back

ISBN:978-93-8901-205-7

Author:VIJAY SHARMA

Pages:199

MRP:Rs.199/-

Stock:In Stock

Rs.199/-

Details

अनुपम भाई अक्सर कहा करते थे कि प्रकृति का अपना कैलेण्डर होता है और कुछ सौ बरस में उसका एक पन्ना पलटता है। नदी को लेकर क्रान्ति एक भोली-भाली सोच है इससे ज़्यादा नहीं। वे कहते थे हम अपनी जीवन-चर्या से धीरे-धीरे ही नदी को ख़त्म करते हैं और जीवन-चर्या से धीरे-धीरे ही उसे बचा सकते हैं। उनका ‘प्रकृति का कैलेण्डर’ ही इस कथा का आधार बन सका है। नारों और वादों के स्वर्णयुग में जितनी बातें गंगा को लेकर कही जा रही हैं यदि वे सब लागू हो जाये तो क्या होगा? बस आज से 55-60 साल बाद सरकार और समाज के गंगा को गुनने-बुनने की कथा है ‘माटी मानुष चून'। -अभय मिश्रा

Additional Information

पुस्तक अंश : “एक हिलसा तेज़ी से समुद्र की तरफ़ भाग रही थी, साथ में उसके दो छोटे बच्चे थे। काँटे और जाल से बच पाना लगभग असम्भव था, किस्मत से बचती बचाती वह किसी तरह आगे बढ़ रही थी। उसकी साँसें फूल रही थी और हिम्मत जबाव दे रही थी, आँखें बन्द किए दोनों बच्चे माँ के पंखों से चिपके आगे बढ़ रहे थे, एकाएक किसी पावर प्लाण्ट का छोड़ा हुआ गरम पानी उनकी तरफ़ बढ़ा, हिलसा ने पानी के बदलते तापमान से आती हुई मौत का अन्दाज़ा लगा लिया और बच्चों को अपने पंख में छुपा पूरी ताकत से गहरे पानी में गोता लगा दिया, नीचे ओर नीचे, ओर भी नीचे.... उसे पता था जीवन पाताल में छुपा है। एक साँस लेने के बाद उसने ऊपर की ओर देखा, सैकड़ों उलटी पड़ी मछलियाँ पानी की लहरों के साथ हिल रही थी, देखते ही देखते हिलसा का चेहरा एक औरत के चेहरे में तब्दील हो गया, फिर वह चेहरा ख़ूबसूरत होता चला गया, सुन्दर, बहुत सुन्दर ठीक वैसा ही जैसा साक्षी ने अपने मन में हमेशा से बना रखा था। ”

About the writer

Abhay Mishra

Abhay Mishra पैदाइश और पढ़ाई-मध्य प्रदेश में। पापा सरकारी नौकरी में थे इसलिए प्रदेश के कई हिस्सों (सीधी, रीवा, अम्बाह, होशंगाबाद, खण्डवा, इन्दौर, भिण्ड, ग्वालियर और भोपाल) की संस्कृति ने पोसा। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में डिग्री ली। रोजी रोटी की चिन्ता दिल्ली ले आयी वाया हैदराबाद। नवभारत, ईटीवी, वायस ऑफ़ इंडिया, राज्यसभा टीवी सहित कई चैनलों और अख़बारों में काम करने का मौका मिला। जब मुख्य धारा का मीडिया भरोसा पैदा नहीं कर पाया तो स्वतन्त्र लेखन की तरफ़ मुड़ गये। यथावत में पिछले पाँच सालों से नदियों पर नियमित कॉलम। द प्रिंट, जनसत्ता सहित डिजिटल और प्रिंट माध्यम में स्वतन्त्र लेखन। पूरे गंगापथ (गोमुख से गंगासागर) की अब तक चार बार यात्रा की। देश की तक़रीबन सभी नदियों को छूकर देखने-समझने की कोशिश अनवरत जारी। विभिन्न स्कूलों में बच्चों के साथ नदी संस्कृति और उसके बदलाव पर बातचीत होती रहती है। (लेक्चर थोड़ा भारी शब्द है।) पंकज रामेन्दु संग दर दर गंगे लिखी जो गंगा पर आधारित फ़िक्शनल ट्रैवेलॉग है। इन दिनों इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में नदी संस्कृति को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

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