Sahityik Nibandh : Aadhunik Dristikon

Format:Paper Back

ISBN:978-81-8143-810-2

Author:BACHCHAN SINGH

Pages:192

MRP:Rs.150/-

Stock:In Stock

Rs.150/-

Details

साहित्यिक निबंध आधुनिक दृष्टिकोण

Additional Information

आज की तेज़ी से बदलती हुई दुनिया में आलोचना के लिए सिर्फ़ आगे ही आगे देखना कई तरह के ख़तरों को जन्म दे सकता है। ज़रूरी बात यह है कि जितनी निगाह अपने समय और भविष्य की ओर जाय उतना ही अतीत को जाँचने परखने का काम करे। इसी को बच्चन सिंह ने 'पुनि-पुनि देखिय' कहा है। उनके दृष्टिकोण में पुरानी चीजों को देखना तभी तक सार्थक है जब वह उनमें से नया आविष्कृत करता चले। इस संग्रह के सभी निबन्धों में बच्चन सिंह ने पुराने को इसी नज़रिये से देखा है। कि उसमें से क्या कुछ नया हासिल किया जा सकता है। अकारण नहीं है कि एक ओर वे आचार्य शुक्ल के इतिहास, घनानन्द की कविता, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अन्तर्विरोधों और तुलसीदास पर नजर डालते हैं और दूसरी ओर नयी कविता, 'कलम का सिपाही', 'भारत-भारती' और उन्नीसवीं शताब्दी के नवजागरण पर। इन्हीं के बीच ग्राम्शी और दलित साहित्य के साथ हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन के सतत विवादग्रस्त विषय को भी वे उठाते हैं। संग्रह का अन्तिम लेख जन्मदिन एक अत्यन्त रचनात्मक प्रयास है जिसके बहाने उन्होंने इसी नये और पुराने की आवाजाही को फिर से रचा है। यह एक दुखद विडम्बना ही है कि इस लेख में आगे की योजनाएँ बनाने का उत्साह प्रदर्शित करने वाले बच्चन सिंह इस लेख को लिखने के कुछ समय बाद दिवंगत हो गये। बच्चन सिंह ने अपनी पहली पुस्तक निराला पर लिखी थी – क्रांतिकारी कवि निराला। इसलिए सहज ही निराला की ही पंक्ति उनके सन्दर्भ में याद आती है – पुनः सवेरा एक और फेरा है जी का।

About the writer

BACHCHAN SINGH

BACHCHAN SINGH बच्चन सिंह अध्ययन-अध्यापन : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, प्रोफ़ेसर, डीन ऑफ़ स्टडीज, कुछ समय कुलपति, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक। 'हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास पिछले दिनों प्रकाशित-चर्चित।

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