Hindutva Ki Rajneeti

Format:Paper Back

ISBN:978-93-8702-468-7

Author:RAJ KISHORE

Pages:192

MRP:Rs.100/-

Stock:In Stock

Rs.100/-

Details

हिन्दुत्व की राजनीति

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इस शताब्दी के श्रेष्ठतम व्यक्तित्व महात्मा गाँधी ने जीवन के गहरे से गहरे सूत्र जिस माध्यम से खोजे थे वह था हिन्दू धर्म। हिन्दू धर्म को उन्होंने एक पंक्ति में परिभाषित किया-'सत्य की अथक खोज।' ऐसे हिन्दुत्व से कोई कैसे झगड़ सकता है ? लेकिन क्या यह वही हिन्दुत्व है, जिसके नाम पर आज द्वेष और हिंसा का दर्शन फैलाया जा रहा है, सामाजिक प्रतिक्रियावाद का पोषण किया जा रहा है तथा एक ऐसे भूमंडलीकरण का समर्थन किया जा रहा है जो भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक सन्तुलन के लिए सबसे नया, लेकिन सबसे गंभीर खतरा है ? स्पष्ट है कि हिन्दुत्व के नाम पर यदि श्रेष्ठ मूल्यों की तलाश की जा सकती है तो हिन्दुत्व के नाम पर ही उनकी हत्या भी की जा सकती है। यही हिन्दुत्व की राजनीति है जिसे उसके धार्मिक पहलुओं से भिन्न करके देखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उसके गर्भ से उपजी विभिन्न संस्थाएँ धर्म की इसी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। अक्सर भारतीय जनता पार्टी की आलोचना यह कह कर की जाती है कि वह सांप्रदायिक है। लेकिन क्या यह आलोचना पर्याप्त है ? इस सांप्रदायिकता के स्रोत कहाँ हैं ? कहाँ से और कौन-से अभिशाप शुरू होते हैं ? ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' क्या राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का नुस्खा है या संस्कृति और राष्ट्रीयता, दोनों को विकृत ओर बर्बर करने का एक बीमार उपक्रम ? कठिनाई यह भी है कि यह चुनौती जितनी गहरी है, देश का राजनीतिक प्रतिष्ठान इस चुनौती के प्रति उतना ही उदासीन है। रणनीति सिर्फ भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की बनायी जा रही है और सत्ता की वैधता के क्षरण को रोका नहीं जा रहा है। इस पुस्तक के लेखकों का निष्कर्ष यह है कि भारत में अगर तानाशाही आयेगी, तो सत्ता की वैधता के इस शून्य से ही।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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