Stri Ke Liye Jagah

Format:Paper Back

ISBN:978-93-87409-03-3

Author:RAJ KISHORE

Pages:160

MRP:Rs.350/-

Stock:In Stock

Rs.350/-

Details

स्त्री के लिए जगह

Additional Information

स्त्री क्या चाहती है, यह इसीलिए स्पष्ट नहीं हो पाया है क्योंकि अपनी मर्जी से चाहने की छूट उसके लिए एक सर्वथा अपरिचित अनुभव है। यह एकमात्र ऐसी जाति है, जो कई हजार वर्षों से पराधीन है। इसीलिए स्त्री को 'अन्तिम उपनिवेश' कहा गया है। लेकिन कोई भी उपनिवेश एक दिन में नहीं टूटता। उसके जोड़ धीरे-धीरे शिथिल होते हैं। पश्चिम में, जहाँ बड़ी संख्या में स्त्रियाँ स्वाधीनता का हर प्रकार की स्वाधीनता का अनुभव कर रही हैं, वे अब पहले की तरह रहस्यपूर्ण नहीं रहीं। वे भी उतना ही नग्न यथार्थ हैं, जितना वहाँ के पुरुष कहना न होगा कि इसलिए भी स्त्री-पुरुष सम्बन्ध वहाँ काफी उलझनमय होते जा रहे हैं। दरअसल, स्वतन्त्र पुरुष यह तय नहीं कर पाया है कि नव-स्वतन्त्र स्त्री के साथ कैसे पेश आया जाये। अनेक स्त्रियाँ भी नहीं जानतीं कि अपनी इस स्वतन्त्रता का क्या करें। सो वे कभी-कभी अपने लिए ऐसा जीवन रचती हैं, जो फिर से एक नये रहस्य लोक की सृष्टि करता है। जहाँ इसे ग्लैमर और मीडिया का समर्थन है, उल्लास और यातना की नयी-नयी परतें खुलती हैं। मरलिन मुनरो को इसका एक प्रतीक माना जा सकता है। वैसे सच तो यह है कि हर आदमी-वह स्त्री हो या पुरुष-एक रहस्य है और जीवन का सारा रोमांच भी इसी कारण है, लेकिन जिस अर्थ में स्त्री को रहस्यमयी या छलनामयी बताया जाता रहा है, वह शुद्ध रूप से एक मिथक है। कम-से-कम तब तक, जब तक हम स्त्री का स्वाधीन व सहज चेहरा नहीं देख लेते। -सम्पादक की बात से

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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