Bachche Aur Ham

Format:Paper Back

ISBN:978-81-7055-644-2

Author:RAJ KISHORE

Pages:150

MRP:Rs.125/-

Stock:In Stock

Rs.125/-

Details

बच्चे और हम

Additional Information

बच्चों पर भावुक साहित्य शुरू से ही लिखा जाता रहा है, लेकिन बच्चों की समस्याओं पर विचार करना एक आधुनिक घटना है। निश्चय ही बच्चे आज की तुलना में पहले कहीं अधिक स्वतंत्र थे, क्योंकि उन पर सभ्यता का दबाव कम से कम था। उनके जीवन में विषमता कम थी और रचनात्मकता का अवकाश ज़्यादा। आधुनिक सभ्यता ने बच्चों को भी उपभोक्ता बनाया है और साथ ही एक गहन रूप से प्रतिद्वंद्वी समाज के लिए भी आवश्यक तैयारी करने की जिम्मेदारी भी उनके नरम कंधों पर लाद दी है। बड़ों की महत्वाकांक्षाओं का भार ढोते हुए बच्चे किस तरह का जीवन जीने के लिए विवश हो रहे हैं-यह अब विश्व चिंता का विषय है। इसी प्रक्रिया में शिक्षा के स्वरूप पर न केवल गंभीर पुनर्विचार हुए हैं, बल्कि शिक्षा के नये, मानवीय स्वरूप विकसित करने के प्रयत्न भी। अपने परिवार और परिवेश के साथ बच्चे का रिश्ता भी कम विचारणीय नहीं है। यह वह क्षेत्र है जो बच्चों की नैसर्गिक स्वतंत्रता और स्वाभाविक विकास को तरह-तरह से अवरुद्ध करता है। इसी संदर्भ में बच्चे के मनोविज्ञान का सवाल उठता है और बाल साहित्य की अवधारणा विकसित होती है। बच्चों को मनोरंजन चाहिए, लेकिन क्या जरूरी है कि वह औद्योगिक प्रेरणाओं से पैदा किया गया हो या उन्हें महज नैतिक बनाने के लिए तैयार किया गया हो? दुर्भाग्य से बच्चों की दुनिया आज एक हिंसक दुनिया भी होती जा रही है। इस हिंसा के उत्स कहाँ हैं ? बच्चे लगातार तनावग्रस्त क्यों होते जा रहे हैं ? फ़िल्मों और टीवी का बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है? विज्ञापनों की दुनिया बच्चों के मन को किन शक्लों में ढाल रही है ? यदि आज के बच्चे कल के नागरिक हैं जो वे हैं, तो बच्चों से संबंधित हर सवाल वस्तुतः नागरिक जीवन के ही सवाल हैं और उन पर विचार करना समाज और संस्कृति के मूल ढाँचे पर ही विचार करना है।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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