Manav Adhikaron Ka Sangharsh

Format:Paper Back

ISBN:978-93-87024-90-8

Author:RAJ KISHORE

Pages:174

MRP:Rs.125/-

Stock:In Stock

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मानव अधिकारों का संघर्ष

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मानव अधिकारों की चर्चा एक अपेक्षाकृत ताज़ा घटना है, किन्तु इनका अस्तित्व तभी से रहा है जब से मनुष्य इस धरती पर है। वस्तुतः मनुष्यता की विकास यात्रा मानव अधिकारों की संघर्ष यात्रा ही है। इस प्रक्रिया में दासता खत्म हुई, सामन्तवाद की जंजीरें टूटी और आज यद्यपि पूँजीवाद मानव अधिकारों का सबसे बड़ा प्रवक्ता और साथ ही उनका निर्मम उल्लंघनकर्ता भी है, मानव अधिकारों की चेतना विश्वव्यापी होती जा रही है। इसी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्वीकृत मानव अधिकारों का विश्व घोषणापत्र। उसके बाद हुए तमाम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में स्वीकृत संधियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। यह सच है कि विश्व स्तर पर अभी तक मानव अधिकारों को कानूनी दरजा नहीं मिल पाया है, लेकिन नैतिक और राजनीतिक दबाव ऐसे हैं कि उनकी लम्बे समय तक उपेक्षा नहीं की जा सकती। फिर भी वास्तविकता यही है कि मानव अधिकारों का संघर्ष अभी एक तरह से शैशवावस्था में ही है-ख़ासतौर से उन देशों में, जहाँ राजनीतिक तानाशाही, धार्मिक कट्टरता तथा सामाजिक रूढ़िवादिता की जंजीरें मजबूत हैं। चुनौती यह है कि इन जंजीरों से कैसे लड़ा जाये। न्यायपालिका का कितना सहारा लिया जाये और जन आंदोलनों को कौन-सी शक्ल दी जाये? क्या व्यवस्था के विभिन्न रूपों को मानवीय बनाये बगैर मानव अधिकारों की रक्षा की जा सकती है? लेकिन व्यक्ति को भी तो संस्कारित करना होगा। सवाल यह भी उठता है कि मानव अधिकारों और मानव स्वतंत्रताओं के बीच किस तरह का रिश्ता है? समूहों के मानवाधिकारों की रक्षा कैसे की जाये? मानव अधिकारों के समूचे प्रश्न पर देश के अग्रणी लेखकों तथा विचारकों द्वारा एक सामूहिक विचार-विमर्श।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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