Ashleelata Ka Hamala

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-344-2

Author:RAJ KISHORE

Pages:132

MRP:Rs.350/-

Stock:In Stock

Rs.350/-

Details

अश्लीलता का हमला

Additional Information

अश्लीलता की समस्या उतनी ही पुरानी है जितना सभ्यता का इतिहास। जुगुप्सा में एक ख़ास तरह का रस होता है। लेकिन जो चीज़ आज हमारे सामने है, वह सिर्फ़ अश्लीलता नहीं, बल्कि उसकी बज़ारू व्यापकता और उसके आक्रामक तेवर हैं। अपसंस्कृति की इस आंधी ने नारी देह को ख़ासतौर से अपना निशाना बनाया है, पर पुरुष भी उससे अछूता नहीं है। क्या यह यौन क्रांति है, जो हमें हानिकर वर्जनाओं से मुक्त करेगी या कामुकता की नींव पर टिकी व्यापारिक सभ्यता का निष्ठुर प्रहार, जो हमारी कोमल भावनाओं के साथ अहर्निश खिलवाड़ कर रहा है? बेशक यह एक नयी परिघटना है, जिसे श्लील-अश्लील के पुराने विवादों से नहीं समझा जा सकता। कभी अश्लील एक प्रकार के सार्थक विद्रोह का माध्यम भी था, लेकिन आज यह सिर्फ़ मुनाफ़े की संस्कृति का वाहक है। यानी मनुष्य का मिज़ाज एक स्वाभाविक प्रक्रिया में बदल नहीं रहा है, बल्कि उसे एक कृत्रिम और सुनियोजित अभियान के तहत बदला जा रहा है। अतः अश्लीलता के इस हमले को एक व्यापक आर्थिक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है और तभी उसके खिलाफ़ कोई कारगर रणनीति बनाई जा सकती है। ख़तरा यह भी है कि अश्लीलता की इस बाढ़ का प्रतिवाद करने के नाम पर हम दकियानूसी और प्रतिक्रियावाद का समर्थन न करने लगें। हमें भूलना नहीं चाहिए कि प्रेम और सौंदर्य उच्चतम मानव मूल्य हैं और जो संस्कृति जितनी समृद्ध होती है, उसमें इन मूल्यों का उतना ही उत्कर्ष दिखाई पड़ता है। अतः चुनौती यह है कि मानव मुक्ति के स्वप्न को बरकरार रखते हुए विकृतियों की संस्कृति से कैसे संघर्ष किया जाए, यह पुस्तक इस दिशा में मददगार साबित होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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