Hinsa Ki Sabhyata

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-347-3

Author:RAJ KISHORE

Pages:170

MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

Details

हिंसा की सभ्यता

Additional Information

मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि हथियारों का जितना इस्तेमाल अन्याय का प्रतिवाद करने के लिए हुआ है, उससे कई-कई गुना ज़्यादा इस्तेमाल अन्याय करने या अन्यायी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए किया गया है। इसका स्वाभाविक कारण यह है कि हिंसा के साधनों पर ताकतवर लोगों का अकसर एकाधिकार होता है। आधुनिक युग के पूर्व हिंसा इतने प्रत्यक्ष रूप में और लगातार होती नहीं दिखाई देती थी, तो इसलिए कि हिंसा में सक्रिय हिंसा ही नहीं, उसकी वास्तविक धमकी भी शामिल है। इसलिए आज हिंसा के दृश्य ज़्यादा दिखाई पड़ रहे हैं, तो इसका एक कारण उन लोगों का सिर उठाना भी है जो सदियों से दबा-कुचल कर रखे गये हैं। स्त्रियों द्वारा की जानेवाली कुछ हिंसा को भी इसी कोटि में रखा जा सकता है-यह हिंसा वस्तुतः प्रतिवाद की जरूरत से पैदा हुई है। लेकिन जिस प्रकार की हिंसा ज़्यादा व्यापक है और व्यापकतर होती जाती है, वह व्यक्तियों और व्यक्तियों के बीच राष्ट्र और व्यक्तियों या समूहों के बीच तथा राष्ट्र और राष्ट्रों के बीच है। व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन में बढ़ती हुई हिंसा पश्चिमी संस्कृति की देन है, जहाँ व्यक्तिवाद की कोई सीमा नहीं रह गई है तथा हर आदमी का यह बुनियादी हक माना जाता है कि वह हथियार रख सके। कोई निराशावादी ही ऐसा सोच सकता है। हिंसा के मनोविज्ञान को हम आज बेहतर समझते हैं। पर हिंसा का एक अर्थशास्त्र भी है, एक समाजशास्त्र भी और राजनीति तो है ही। एक अहिंसक समाज बनाने के लिए नैतिक प्रेरणा के साथ-साथ व्यवस्थागत परिवर्तन भी जरूरी है, क्योंकि हिंसा मन में भले ही पैदा होती हो, पर उसका संदर्भ ठोस जीवन स्थितियाँ हैं। ब्रेश्त के एक नाटक में एक युवती पुलिस से कहती है : मुझे तुमसे डर लग रहा है, यह देख कर तुम्हें शर्म नहीं आती है? ऐसी सभ्यता बनाई जा सकती है, जिसमें किसी को किसी से डर न लगे। जरूरत हिंसा के शास्त्र को उसके सभी आयामों में समझने तथा संगठित और निष्ठावान प्रयास करने की है।

About the writer

RAJ KISHORE

RAJ KISHORE राजकिशोर 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्म। शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी), एलएल.बी. तथा बी. कॉम. (ऑनस)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त संपादक। 1990 से 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त संपादक। अन्य प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आजादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, जाति कौन तोड़ेगा तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास)। संपादन : समकालीन पत्रकारिता : मूल्यांकन और मुद्दे। सह-संपादन : मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न' के संपादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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