DHRUVSWAMINI

Format:Paper Back

ISBN:978-93-86799-95-1

Author:Jaishankar Prasad

Pages:64

MRP:Rs.75/-

Stock:In Stock

Rs.75/-

Details

ध्रुवस्वामिनी

Additional Information

प्रसाद के तीन नाटक - चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और ध्रवस्वामिनी - उनके सभी नाटकों में सबसे ज़्यादा चर्चित रहे हैं। मात्र पाठ्य-पुस्तक के रूप में ही नहीं वरन अपने प्रस्तुतीकरण को लेकर भी। जहाँ पहले दोनों नाटक अपनी अनेकानेक प्रस्तुतियों के बावजूद प्रदर्शन एवं अभिनय संबंधी प्रश्नों एवं समस्याओं से घिरे रहे हैं, वहाँ 'ध्रुवस्वामिनी' संभवतः सबसे ज़्यादा प्रदर्शित नाटक तो है ही, इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रदर्शन एवं अभिनय से संबद्ध सबसे कम आपत्तियाँ इसी नाटक पर उठाई गई हैं। इससे नाटक की सफलता एवं लोकप्रियता स्वयं सिद्ध है। कथ्य के साथ ही जुड़ा हुआ जो दूसरा पहलू है, वह है इस नाटक का शिल्प एवं शैली जिस रूप एवं संरचना की खोज में प्रसाद अपने सभी नाटकों के माध्यम से लगे रहे, उन सबका मानो निचोड़ है 'ध्रुवस्वामिनी' इसीलिए यह उनका अंतिम नाटक भी है। अपने कलेवर में सुगठित एवं एक ऐसी संक्षिप्तता लिए हुए जो प्रसाद के अन्य नाटकों में दुर्लभ है। पूरे नाटक में केवल तीन अंक हैं और तीनों अंकों में एक-एक दृश्य। इतना ही नहीं, प्रत्येक अंक में केवल एक ही दृश्यबंध अथवा परिवेश-स्थान, समय और कार्य-व्यापार की अद्भुत समन्विति।

About the writer

Jaishankar Prasad

Jaishankar Prasad जयशंकर प्रसाद जन्म : 30 जनवरी, 1890; वाराणसी (उ.प्र.)। स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक। तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय। पिता देवीप्रसाद तम्बाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार ‘सुँघनी साहू' के नाम से प्रसिद्ध था। पिता के साथ बचपन में ही अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्राएँ कीं। छायावादी कविता के चार प्रमुख उन्नायकों में से एक। एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षों के छोटे-से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबन्ध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ। 14 जनवरी, 1937 को वाराणसी में निधन।

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