MAIN MILITARY KA BOODA GHODA

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-7055-571-1

Author:NAAGARJUN

Pages:110

MRP:Rs.200/-

Stock:In Stock

Rs.200/-

Details

नागार्जुन उन थोड़े-से कवियों में हैं, जो अपनी कविताओं से यह चुनौती पेश करते हैं। उनके साथ सबसे मज़ेदार बात यह है कि साहित्य मर्मज्ञों के लिए अपनी कविताओं के जरिए वे चुनौती भले पेश करते हों, लेकिन खुद साहित्य में नहीं जीते। कविता लिखते समय उनके सामने श्रोता के रूप में बड़े-बड़े कलावंत उतना नहीं रहते, जितना साधारण लोग रहते हैं। इसलिए वे अनुभूतियों और अनुभवों के लिए इन लोगों के बीच इनका हिस्सा बनकर रहते हैं, और कविता लिखते समय अपनी अभिव्यंजना को इन लोगों की स्थिति, जरूरत और समझ के स्तर के अनुरूप ढालकर पेश करते हैं। कैसी भी उतार-चढ़ाव की स्थिति हो, कवि नागार्जुन कविता के साथ अपनी इस हिस्सेदारी में कटौती नहीं करते। इसलिए साहित्य के मर्मज्ञों के लिए उनकी चुनौती बड़ी सताऊ जान पड़ती है। इन रचनाओं का पाठ गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में होता रहा है। कुछ रचनाएं हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में लिप्यन्तरित और अनूदित होकर छपती रही हैं। कुछ बंगला के लघुपत्रों में भी।

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NAAGARJUN

NAAGARJUN जन्म: सन् 1911 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन। जन्मस्थान: ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा (बिहार)। परंपरागत प्राचीन पद्धति से संस्कृत की शिक्षा। सुविख्यात प्रगतिशील कवि-कथाकार। हिंदी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में काव्य-रचना। पूरा नाम वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’। मातृभाषा मैथिली में ‘यात्री’ नाम से ही लेखन। शिक्षा-समाप्ति के बाद घुमक्कड़ी का निर्णय। गृहस्थ होकर भी रमते-राम। स्वभाव से आवेगशील, जीवंत और फक्कड़। राजनीति और जनता के मुक्तिसंघर्षों में सक्रिय और रचनात्मक हिस्सेदारी। मैथिली काव्य-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान तथा मध्य प्रदेश और बिहार के शिखर सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित। प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें: रतिनाथ की चाची, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन, बलचनमा, वरुण के बेटे, नई पौध आदि (उपन्यास); युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ, चंदना, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, हजार-हजार बाँहोंवाली, पका है यह कटहल, अपने खेत में, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा (कविता-संग्रह); भस्मांकुर, भूमिजा (खंडकाव्य); चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ (हिंदी में भी अनूदित मैथिली कविता-संग्रह); पारो (मैथिली उपन्यास); धर्मलोक शतकम् (संस्कृत काव्य) तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियाँ।

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