Bharat Ki Awdharna

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8956-334-4

Author:SHAMBUNATH

Pages:294

MRP:Rs.500/-

Stock:In Stock

Rs.500/-

Details

भारत की अवधारणा

Additional Information

भारत में एक नया भारत जन्मा है। धर्म, इतिहास, साहित्य, संस्कृति और राजनीति ही नहीं, सामाजिक जीवन की बहुत सारी चीजों के अर्थ बदलते जा रहे हैं। विश्व भर में सांस्कृतिक सिकुड़न के हिंसक दृश्य हैं। भारत की अवधारणा इस देश की सभ्यता की खोज के साथ 21वीं सदी के बदलावों का मूल्यांकन है। परंपराओं से संवाद करते हुए यह पुस्तक उन तथ्यों, मूल्यों और स्वप्नों को सामने लाती है जिन्हें वर्तमान समय में बुलडोजर किया जा रहा है। नये भारत में भारत का इतिहास और भविष्य-दृष्टि भग्नावस्था में है। पोस्ट टूथ का जमाना है और झूठ दिग्विजय पर है। विमर्शों को पीछे छोड़ते हुए महाविमर्श है। इन स्थितियों में शंभुनाथ की पुस्तक भारत की अवधारणा एक राष्ट्रीय महाख्यान की खोज है जो साझा सच, आम असहमति और मनुष्यता के पुनर्निर्माण की राहें खोलती है। सभ्यता विमर्श को नया मोड़ देने वाले सुपरिचित लेखक शंभुनाथ वर्तमान समय की विडंबनाओं और संभावनाओं की इस पुस्तक में प्रखर आलोचनात्मक विवेचना करते हैं। यह जितनी रोचक है, उतनी ही पारदर्शी! क्या भारत अभी भी सोच सकता है? वैचारिक संकट के दौर में यह पुस्तक प्राचीन और आधुनिक दृष्टांतों के बीच से यही कहती है-हाँ, भारत सोचता है!

About the writer

SHAMBUNATH

SHAMBUNATH हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक। हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1979 से 2014 तक अध्यापन। 2006-08 के बीच केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक पद पर रहते हुए देश और विदेश में हिंदी के लिए विपुल कार्य। प्रमुख पुस्तकें: संस्कृति की उत्तरकथा (2000), धर्म का दुखांत (2000), दुस्समय में साहित्य (2002), हिंदी नवजागरण और संस्कृति (2004), सभ्यता से संवाद (2008), रामविलास शर्मा (2011), भारतीय अस्मिता और हिंदी (2012), कवि की नई दुनिया (2012), राष्ट्रीय पुनर्जागरण और रामविलास शर्मा (2013), उपनिवेशवाद और हिंदी आलोचना (2014), प्रेमचंद का हिंदुस्तान: साम्राज्य से राष्ट्र (2014)। प्रमुख संपादन: जातिवाद और रंगभेद (1990), गणेश शंकर विद्यार्थी और हिंदी पत्राकारिता (1991), राहुल सांकृत्यायन (1993), आधुनिकता की पुनर्व्याख्या (2000), रामचंद्र शुक्ल के लेखों का बांग्ला अनुवाद ‘संचयन’ (1998), सामाजिक क्रांति के दस्तावेजश् (दो खंड, 2004), 1857, नवजागरण और भारतीय भाषाएँ (2007), भारतेंदु और भारतीय नवजागरण (2009), संस्कृति का प्रश्न: एशियाई परिदृश्य (2011), हिंदी पत्राकारिता: हमारी विरासत (दो खंड, 2012), शब्द का संसार (2012), प्रसाद और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन (2013)।

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