Nibandhon Ki Duniya: Harishankar Parsai

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-491-0

Author:HARISHANKAR PARSAI

Pages:176

MRP:Rs.250/-

Stock:Out of Stock

Rs.250/-

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निबन्धों की दुनिया : हरिशंकर परसाई

Additional Information

परसाई का समग्र लेखन साहित्य की एक नई रुचि व संस्कार का परिचय देता है। इसीलिए उनकी रचनाओं को व्यंग्य एवं हास्य के पुट के बावजूद हल्के ढंग से या बिना गम्भीरता के नहीं लिया जा सकता। उनका साहित्य मूलतः अस्वीकार का साहित्य है। व्यवस्था के प्रति उसका स्वर प्रतिरोध और प्रतिवाद का है। वह व्यक्ति की गरिमा और स्वतन्त्रता के पक्ष में दृढ़ता से खड़ा होता है। परसाई के राजनीतिक लेखों में जो बात सबसे ज़्यादा हैरान करती है वो है सीधे टकराने की हिम्मत लेखक नाम लेकर सत्ता के ठेकेदारों की खिल्ली उड़ाता है। बहुत बार, वे शालीनता की सीमा पार करते भी दिखते हैं क्योंकि वे सत्ता के दोगले चरित्र को स्वीकार नहीं कर पाते। गणतन्त्र दिवस की झाँकियाँ उन्हें झूठ बोलती लगती हैं जो विकास और इतिहास की रम्य प्रदर्शनी के पीछे सक्रिय शोषण-तन्त्र का अहसास नहीं होने देती (ठिठुरता हुआ गणतन्त्र)। इन सभी स्थितियों पर कभी कभी वे इतने क्षुब्ध हो उठते हैं कि लिखते हैं 'भारत को चाहिए : जादूगर और साधु'। वास्तव में, इन राजनीति सम्बन्धी लेखों का दायरा इतना बड़ा है कोई भी कुचक्र उनकी दृष्टि से बचता नहीं। वो राष्ट्रीय स्तर पर बिहार के चुनाव हों (हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं) या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका जैसे देश की मानव अधिकारों की रट। 'मानवीय आत्मा का अमरीकी हूटर' लिखते हए वे स्पष्ट करते हैं कि विश्व के सर्वसत्तावादी देश मानव मल्यों व मानव अधिकारों की दुहाई। देते हए भी अपनी नीतियों में मानव विरोधी हैं।। परसाई अपनी कलम को औजार बनाकर इन स्थितियों के विरुद्ध सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहते हैं। वे मानते हैं कि साहित्यकार की चीख, उसका। दर्द साहित्य में छाए सन्नाटे को तोड़ सकता है।

About the writer

HARISHANKAR PARSAI

HARISHANKAR PARSAI जन्म: 22 अगस्त, 1924। जन्म-स्थान: जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। मध्यवित्त परिवार। दो भाई, दो बहनें। स्वयं अविवाहित रहे। मैट्रिक नहीं हुए थे कि माँ की मृत्यु हो गई और लकड़ी के कोयले की ठेकेदारी करते पिता को असाध्य बीमारी। फलस्वरूप गहन आर्थिक अभावों के बीच पारिवारिक जिम्मेदारियाँ। यहीं से वास्तविक जीवन संघर्ष, जिसने ताकत भी दी और दुनियावी शिक्षा भी। फिर भी आगे पढ़े। नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.। फिर ‘डिप्लोमा इन टीचिंग’। प्रकाशित कृतियाँ: हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडण्डियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर (सा.अ. पुरस्कार); तुलसीदास चंदन घिसैं, हम इक उम्र से वाकिफ हैं, जाने पहचाने लोग (व्यंग्य निबंध-संग्रह)। रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में। ‘परसाई रचनावली’ शीर्षक से छह खंडों में रचनाएँ संकलित। निधन: 10 अगस्त, 1995

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