HINDI AALOCHANA KE NAYE VACHARIK SAROKAR

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ISBN:81-7055-138-2

Author:ED. Dr. KRISHNA DUTT PALIWAL

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MRP:Rs.450/-

Stock:Out of Stock

Rs.450/-

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हम भारतीयों की परम्परा रही है किसी भी विचार, विचारधारा, वस्तु, स्थिति, मूल्य, प्रकरण को ‘जस का तस’ स्वीकार न करना। रस हो या ध्वनि हमने लगातार ‘शंका’ उठाई हैµप्रश्नाकुलता के साथ सदियों तक इनकी सार्थकता, प्रासंगिकता, शक्ति एवं सीमा पर वाद-विवाद-संवाद किया है। हमारे चिन्तन के केन्द्र में रचनाकार नहीं रहा हैµकृति या कलाकृति रही है। ‘पाठ’ केन्द्रित बहुलार्थक ‘भाष्य’ और ‘टीका’ में हमारी क्षमताओं का आश्चर्यजनक विकास हुआ। अभिनव गुप्त जैसा भाष्यकार-टीकाकार तो पूरे विश्व में दिखाई नहीं देता। लेकिन अपनी ‘आत्मधिक्कार’ की भावना के कारण कला-कृति-संस्कृति-आलोचना के सन्दर्भ में भी हम बगलें झाँकते घूम रहे हैं। उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हमें अपने काव्यशास्त्रा की जड़ों की ओर लौटने का सुअवसर मिल रहा है। हम मिशेल फूको के विमर्श-सिद्धान्त तथा देरिदा के ‘विरचनावाद’ आदि के सन्दर्भ से उनके साहित्य-चिन्तन को टटोल सकते हैं। विश्वभर में हो रही थ्योरी-केन्द्रित बहस से कतराने की जरूरत नहीं है। अपने को बार-बार जाँचने-परखने, जानने का समय साहित्य-सिद्धान्तों के क्षेत्रा में हमें मिला हैµउसका उपयोग करना चाहिए। यह पुस्तक विद्वानों के लिए नहीं है और न अतिरिक्त ज्ञान-दम्भ में निमग्न शास्त्रा-जड़ता का रोना रोनेवालों के लिए है। हर देश और काल का पाठक शास्त्रा की जड़ता का अतिक्रमण करके ही गतिशील जीवन-यथार्थ का साक्षात्कार करता रहा है और अब तो ‘पाठकवादी आलोचना’ का जश्माना है। रामचन्द्र शुक्ल और अज्ञेय, रिचर्ड्स और नार्थ्रोप फ्राई तो पाठकवादी-आलोचना के अग्रदूत कहे जा सकते हैं। फिर हम भारतीयों ने रस-मीमांसा में अर्थ-मीमांसा (भाष्य-विज्ञान) को सदैव आदर से अपनाया है।

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About the writer

ED. Dr. KRISHNA DUTT PALIWAL

ED. Dr. KRISHNA DUTT PALIWAL जन्म : 4 मार्च, 1943 को सिकंदरपुर, जिला फर्रुखाबाद (उ.प्र.) में। प्रकाशन : भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य-संसार, आचार्य रामचंद्र शुक्ल का चिंतन जगत्, मैथिलीशरण गुप्‍त : प्रासंगिकता के अंत:सूत्र, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. अंबेडकर और समाज-व्यवस्था, सीय राम मय सब जग जानी, सर्वेश्‍वरदयाल सक्सेना, हिंदी आलोचना के नए वैचारिक सरोकार, गिरिजा कुमार माथुर, जापान में कुछ दिन, डॉ. अंबेडकर : समाज-व्यवस्था और दलित-साहित्य, उत्तर आधुनिकता की ओर, अज्ञेय होने का अर्थ, उत्तर-आधुनिकतावाद और दलित साहित्य, नवजागरण और महादेवी वर्मा का रचनाकर्म : स्त्री-विमर्श के स्वर, अज्ञेय : कवि कर्म का संकट, निर्मल वर्मा (विनिबंध) दलित साहित्य : बुनियादी सरोकार, निर्मल वर्मा : उत्तर औपनिवेशिक विमर्श। लक्ष्मीकांत वर्मा की चुनी हुई रचनाएँ, मैथिलीशरण गुप्‍त ग्रंथावली का संपादन। पुरस्कार/सम्मान : हिंदी अकादमी पुरस्कार, दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन सम्मान, तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय, जापान द्वारा प्रशस्ति-पत्र, राममनोहर लोहिया अतिविशिष्‍ट सम्मान, सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, साहित्यकार सम्मान, विश्‍व हिंदी सम्मान, विश्‍व हिंदी सम्मेलन, न्यूयॉर्क में सम्मानित। दिल्ली विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे तथा तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर।

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