Book Review : Madaripur Junction by Balendu Dwivedi


    Date: 20-7-2018

    मदारीपुर जंक्शन : जहां उतरते ही आप रह-रहकर हंसेंगे और कभी अपना दिल भी भारी पाएंगे

    ‘मदारीपुर जंक्शन’ श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘रागदरबारी’ की एक अन्य कड़ी के रूप में देखे जाने की काबिलियत रखता है

    इस पुस्तक का एक अंश : ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश के एकदम पूर्वी कोने में, अंतड़ियों में किडनी की तरह घुसा हुआ यह गांव था - मदारीपुर. उसे गांव कहने पर तो उसकी तौहीन ही होती थी, लेकिन दुर्भाग्य से वह कस्बा होते-होते रह गया था...यहां की मिट्टी में शारीरिक रूप से किये जाने वाले कामों के लिए भले ही अवसरों की कमी हो, पर यहां के वातावरण में ‘मानसिक क़वायद’ और ‘बौद्धिक जुगाली’ के लिए अनन्त अवकाश था. फिर भी मदारीपुर को मजबूरन गांव ही कहना पड़ता था. वह तो बुरा हो उस पटवारी का, जिसने शायद खुन्नस में इसका यह नामकरण कर दिया था, अन्यथा इतने भोले-भाले इंसान, इतनी बौद्धिक उर्वरता किसी दूसरे ग्रह पर भी शायद ढूंढने से न मिलती...

    ...गांव के होनहारों की कई संलग्न पीढ़ियां अपने-अपने खेलों को अंजाम देने में लग गयी थीं...गुल्ली डंडा, कबड्डी और क्रिकेट...देशभक्ति के शौक़ीन कुछ बच्चों ने हॉकी नामक कोई अज्ञात खेल खेलने का मन ज़रूर बनाया था, पर क्रिकेट के जांबाज़ खिलाड़ियों ने निरन्तर शारीरिक-प्रहार के द्वारा उनका हृदय-परिवर्तन कर डाला था.’

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    उपन्यास : मदारीपुर जंक्शन

    लेखक : बालेन्दु द्विवेदी

    प्रकाशक : वाणी

    कीमत : 250 रुपये
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    सवर्णों का दलितों के साथ भेदभाव संविधान लागू होने के 68 सालों बाद आज भी देश के ज्यादातर गावों, कस्बों और शहरों का सच है. संविधान के जरिए दलितों को दिया गया सवर्णों के समान सम्मान से जीने अधिकार आज भी उनके लिए बहुत दूर की कौड़ी है. यह उपन्यास पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में आज तक मौजूद दलित और सवर्ण संघर्ष की गवाही देता है. बालेन्दु द्विवेदी ने ‘मदारीपुर जंक्शन’ में जिस बेहद चुटीले और आत्मव्यंग्यात्मक अंदाज में निचली कही जाने वाली जातियों के संघर्ष की कथा कही है, वह बेहद सराहनीय और पठनीय प्रयास है.

    आम तौर पर गांवों को शहरों की अपेक्षा शांत, राजनीतिक उठा-पटक से दूर और परस्पर सहयोगात्मक रवैये वाला माना जाता है. लेकिन असल में गांवों में रहने वाले जानते हैं कि वहां के जीवन में एक अलग ही किस्म की राजनीतिक और सामाजिक प्रतिद्वंदिता है. बालेन्दु ने बहुत ही हंसोड़ और व्यंग्यात्मक अंदाज में पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्र खींचा है. एक जगह वे लिखते हैं -

    ‘पट्टी की ही प्रतिभा के चलते यह गांव पूरे इलाके़ में अपने हुड़दंगी हुनर के लिए ख्यात हो पाया था. पच्चीस-पचास कोस तक के लोग यह नतमस्तक होकर स्वीकार करते थे कि हुड़दंग के मामले में, जिसे कई लोग विद्वेषवश ‘नंगई’ भी कहते मिल जाते थे, मदारीपुर का कभी कोई सानी नहीं रहा...

    ...कब किसकी टांग खींचनी है, कब किसकी टांग में अड़ंगा मारना है, किसके ऊपर कीचड़ उछालना है, किसे पीछे धकेलने के लिए गड्ढा खोदना है और किसकी *** में चिकोटी काटना है - मदारीपुर में इन विषयों के लिये बाक़ायदा शिक्षा की ज़रूरत समझी जाती थी और इन विषयों के मर्मज्ञ इस पर निरन्तर अनुसन्धान में लगे रहते थे.’

    आम आदमी का ‘जूते खाना’ तो पहले से ही चलन में है, लेकिन अब उसके द्वारा ‘जूते फेंकना’ अपने राजनीतिक आक्रोश को व्यक्त करने का एक मजेदार जरिया बन गया है! हाल के समय में कई नेता इसका शिकार भी बने हैं. उपन्यासकार ‘जूते मारने’ की कवायद को एक ऐसे सशक्त हथियार के तौर पर देखता है, जिसका प्रयोग जनता को अपने हित में कानूनों का पालन करवाने में करना चाहिए. चुटीले अंदाज में ‘जूतपत्रम’ के विचार को व्यावहारिक प्रयोग में लाने की सलाह देते हुए लेखक अपने एक पात्र बैरागी बाबू से कहलवाते हैं -

    ‘लेकिन जूता मारना तो गै़र-कानूनी है...!’

    ‘किसने कह दिया तुमसे भाई...? हमारे संविधान में ऐसा लिखा है कहीं पर...? आईपीसी, सीआरपीसी की किस धारा में इसे ग़ैर-कानूनी बताया गया है? बेटा...! जूता तो हमारी जातीय संस्कृति की नींव है...कानून तो निर्जीव वस्तु है. उसमें जान आती है जूते से...! कानून का अनुपालन तभी हो सकेगा, जब उसमें जूते को अनिवार्य तौर पर जोड़ा जाएगा...! इस देश को एक सच्चे ठोकपाल की जरूरत है...इसलिए जब भी कोई कानून बने तो उसके अनुपालन के लिए एक जूताधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए...जूताधिकारी राजधानी में बैठे और देश के कोने-कोने में तैनात अपने अधीनस्थों के माध्यम से हर सम्मानित नागरिक को उसके सुबह उठते ही, बिना पूछे दस जूता लगाये...आज तो प्रॉब्लम यह है चार आदमी जूता खाते हैं और आठ आदमी को एलीट-क्लास मानकर छोड़ दिया जाता है.’

    पूर्वी उत्तर प्रदेश के दसियों गांवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना यह गांव मदारीपुर ढेर सारी सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं और विचित्रताओं से भरा है. उपन्यास में निचली समझी जाने वाली जाति का नायक ‘चइता’ अपने अभावों को दूर करने और अधिकारों को पाने के लिए खड़ा होता है. लेकिन इस संघर्ष में वह गांव की हद दर्जे की घटिया राजनीति और षड्यन्त्र का शिकार हो जाता है. उसकी हत्या कर दी जाती है. चइता के शव को उसकी पत्नी जिस तरह से अंतिम विदाई देती है, वह वर्णन पाठकों के भीतर करूणा और वेदना की गहरी हूक पैदा करता है. एक झलक -

    ‘लगभग डेढ-दो घंटे तक मेघिया रुक-रुककर फावड़ा चलाती रही. अन्त में उसने फावड़ा एक ओर फेंका और चइता के शव को घसीटते हुए खोदे हुए गड्ढे में लाकर रख दिया. फिर वह गड्ढे में नीचे उतरकर उसके एक कोने में घुटने के बल बैठ गयी और चइता के साथ लिपटकर रोने लगी. इस बार मेघिया की आवाज़ में हृदय को कंपा देने वाली करूणा थी. थोड़ी देर तक यह सब चलता रहा. फिर मेघिया झटके से उठी और गड्ढे से बाहर निकाली गयी मिट्टी को कभी फावड़े से और कभी अपने हाथों की अंजुरी से चइता के शव के ऊपर उड़ेलने लगी मानो अब जाकर उसे अन्तिम रूप से विदा कर रही हो! चइता का शव ज्यों-ज्यों ढंकता जाता, मेघिया की आंखों से आंसू बहने की तीव्रता बढ़ती जाती थी...

    मेघिया एक मृत शरीर के साथ किये जाने वाले ज़माने के सारे रस्मो-रिवाज अपने तरीके़ से निभा चुकी थी और अब वह बिल्कुल ही शान्त हो गयी थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो!’

    उपन्यास के पात्र अपनी अड़ंगेबाजी, पैंतरेबाजी, धोखेबाजी, मक्कारी, तीन-तिकड़म और खींच-तान में आकण्ठ डूबे हैं और जब-तब अपनी इन हरकतों और इनके प्रदर्शन पर खुलकर अट्टाहस करते हैं. इन सबके बहाने लेखक ने पूरे उपन्यास में सहज, लेकिन बेहद चुटीले और तीव्र हास्य के जो शानदार जलवे बिखेरे हैं वे इसे जबरदस्त पठनीय बनाकर छोड़ते हैं. बालेन्दु द्विवेदी में हर एक विद्रूपता, विसंगति पर हंसने-हंसाने और मदारी की तरह मजमेबाजी करने का जबरदस्त हुनर है. उपन्यास की गंवई भाषा की रवानगी और ताजगी पाठकों को न सिर्फ प्रभावित करती है बल्कि अंत तक बांधे भी रखती है.

    यह कहना गलत नहीं होगा कि बालेन्दु द्विवेदी का यह उपन्यास ‘रागदरबारी’ की एक दूसरी कड़ी के रूप में देखे जाने की काबिलियत रखता है. अशोक चक्रधर के शब्दों में ‘इसमें स्वयं को तीसमारखां समझने वाले लोगों का भोलापन भी है और सौम्य दिखने वाले लोगों का भालापन भी’. नौ रसों में से हास्य-व्यंग्य और करूणा ऐसे दो रस हैं, जिनकी गिरफ्त से कोई नहीं बच सकता. लेखक का यह पहला ही उपन्यास इन दो रसों के ढेर सारे कंटेनर लेकर मदारीपुर जंक्शन पर आपके इंतजार में खड़ा है. हिन्दी साहित्य के यात्रा प्रेमियों को एक बार मदारीपुर जंक्शन की यात्रा जरूर करनी चाहिए.
    https://satyagrah.scroll.in/article/117773/book-review-madaripur-juction-balendu-dwivedi

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