Book Review : Nishiddh by Taslima Nasrin


    Date: 28-4-2018

    तसलीमा की 'निषिद्ध' : नारी उत्पीड़कों पर कलम का वार
    -----------------------------------------------------------------

    ‘‘उसका लिखना, उसकी सोच, उसका सब कुछ तो निषिद्ध कर ही दिया है, उस समूचे मनुष्य को ही निषिद्ध कर दिया है इस उपमहादेश ने। मैं अपनी बात कर रही हूं। मुझे नहीं लगता दुनिया में ऐसा कोई लेखक है जिसके सृजन को ही नहीं, खुद उसको पूरे समाज, और पूरी राष्ट्र व्यवस्था ने इतने शिद्दत से नकारा हो। लेखक, सांवादिक, बुद्धिजीवी सभी आँखें मूंद लेते हैं, कान बंद कर लेते हैं। मुंह पर ताला जड़ लेते हैं, जब मेरे विरुद्ध सरकार कोई अन्यायपूर्ण फैसला लेती है। पिछले बीस वर्षों से यही देखती आ रही हूं। बांग्लादेश से एक लोकप्रिय नारीवादी लेखिका को निकाल दिया गया था और देश के लोगों ने चुपचाप उपभोग किया था उस घिनौने अन्याय का। कोई एक शब्द भी नहीं बोला था।’’

    नारी सरोकारों और पुरुष वर्चस्ववादी समाज पर बेबाक कलम चलाने वाली साहसी बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन की पुस्तक ‘निषिद्ध’ को वाणी प्रकाशन द्वारा हिन्दी में अनुवाद कर पाठकों के लिए उपलब्ध कराया है। सांत्वना निगम ने अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि लेखिका का मंतव्य मूल भाषा की लय में प्रवाहित रहे। संपादन विमलेश त्रिपाठी द्वारा किया गया है।

    पुस्तक में चालीस से अधिक लेखबद्ध घटनाओं और निबंधात्मक लेखों में बार-बार लेखिका का नारी अस्मिता और उसके साथ पुरुष-प्रधान समाज द्वारा सदियों से आज तक किये जा रहे अत्याचारों, भेदभावपूर्ण व्यवहार और उत्पीड़न का दर्द छलक पड़ता है।

    तसलीमा आधुनिक प्रगतिशील समाज और भू-मंडलीकरण के दौर में भी पुरुष समाज द्वारा नारी के प्रति न बदलने वाले नज़रिये का भी इस पुस्तक में वर्णन करती हैं तथा प्राचीनकाल में किये नारी उत्पीड़न से उसकी तुलना करती हैं। वे इस भेदभाव से इतनी व्यथित हैं कि उन्हें सभी पुरुषों में नारी उत्पीड़क बहशी का अक्स दिखाई पड़ता है।

    "तसलीमा नसरीन ने आयेदिन हो रही बलात्कार की घटनाओं पर अपने विचार लिखे हैं जिसमें उन्होंने कई सवाल भी खड़े किये हैं और समाज को आईना दिखाने की कोशिश की है। वे लिखती हैं: ‘बलात्कार करने पर पुरुष सोचता है वह पौरुष का प्रमाण दे रहा है। सच कहा जाये तो पुरुषतंत्र स्त्री शरीर का जितना बलात्कार कर रहा है उससे कहीं ज्यादा स्त्री के मन का बलात्कार हो रहा है। पुरुष बलात्कार कर रहा है, मन के स्वाभाविक विकास पर, प्राणों पर, मन के उच्छवास पर, असीम संभावनाओं पर, स्वप्नों पर, स्वतंत्रता पर। शरीर के घाव सूखे जाते हैं, मन के घाव नहीं सूखते।’’

    लेखिका ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए लिखा है: ‘बलात्कार बन्द होगा, कब और क्या करने से बंद होगा इस प्रश्न का सबसे अच्छा उत्तर है -‘‘जिस दिन मर्द बलात्कार करना बंद करेगा, उसी दिन बलात्कार बंद होगा।’’ कब, किस समय बंद करेंगे -यह पूरी तरह से ही पुरुषों का मामला है।’

    हम जब तसलीमा नसरीन को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे समाज की बात को अपने तरीके से कहती हैं। वे स्पष्ट हैं, बेबाक हैं, संवेदनशील हैं, प्रवाहात्मक लहजे में अपनी बात रखती हैं जो आसानी से समझ आती है।

    वे अपने साथ जारी भेदभाव से भी आहत और व्यथित हैं तथा इसके पीछे भी पुरुष मानसिकता को ही दोषी मानती हैं। खुले विचारों से लिखने के कारण उन्हें बांग्लादेश में भारी विरोध का सामना करना पड़ा। उनके खिलाफ जुलूस निकाले गये, रैलियां हुईं और उन्हें जान से मारने को कहा गया। वे कहती हैं कि उनके साथ कोई खड़ा नहीं हुआ। सरकारों ने कट्टरपंथ के सामने हथियार डाल दिये और उन्हें देश से निकलने को मजबूर होना पड़ा। प्रकाशकों ने उन्हें छापना बंद कर दिया।

    इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि किसी लेखक को निर्वासित जीवन जीने को विवश किया जाये। लेकिन सबसे अच्छी बात रही कि तसलीमा नसरीन पीछे नहीं हटीं, और आज भी वे उसी तरह लिख रहीं हैं। उनके विचारों को और अधिक बल मिला है। उन्हें पहले से ज्यादा पढ़ा जा रहा है। उनकी एक किताब खरीदने के बाद आप उनकी दूसरी किताब भी खरीदने की सोचते हैं, और ऐसा अक्सर होता है।

    तसलीमा नसरीन में यह खूबी है कि वे बेहद तर्क संगत तथा ईमानदार तथ्यों के साथ अपनी बात रखती हैं तथा सिलसिलेवार उसे सिद्ध करती हैं। वे ऐसे में तमाम सरकारों, राष्ट्राध्यक्षों, मीडिया और समाज के ठेकेदारों से सवाल भी करती हैं। साथ ही नारी उत्पीड़न के लिए उन्हें कठघरे में भी खड़ा करती हैं।

    पुस्तक का हर अध्याय मानवीय संवदेनाओं को उद्वेलित करता है जिससे पाठक लेखिका के बेबाक और ईमानदार लेखन से सहमत हुए बिना नहीं रहता। यह पुस्तक बहुत ही पठनीय है। उनके दर्द को बयां करती ‘निषिद्ध’ के ये शब्द -‘‘आज पतिता प्रथा या यौन अत्याचार दुनिया का अन्यतम और वृहत्तम पेशा तो है ही इसके अलावा सबसे तेज गति से बढ़ने वाला सफल व्यवसाय का प्रतिष्ठान है। इस कारखाने का कच्चा माल है अभागे, अनाथ शिशुओं की देह और गरीब लड़कियों का शरीर।’


    http://kitab.samaypatrika.com/2018/04/taslima-nasreen-nishidh-vani-prakashan-book-review.html

    << Back to Media News List