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वाक् के बारे में...

हिन्दी के विराट जनक्षत्रे में नयी सदी की बेचैनियाँ और आकांक्षाएँ जोर मार रही हैं। हिन्दी के नये पाठक को अब शुद्ध ‘साहित्यवाद’ नहीं भाता। वह समाज को उसके समग्र में समझने को बेताब है। साहित्य के राजनीतिक पहलू ही नहीं, उसके समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक पहलुओं को पढ़ना नये पाठक की नयी माँग है। वह इकहरे अनुशासनों के अध्ययनों से ऊब चला है और अन्तरानुशासनिक ;इंटरडिसिपि्लनरी) अध्ययनों की ओर मुड़ रहा है जहाँ नये–नये विमर्श, उनके नये रंग–रेशे एक–दूसरे में घुलते–मिलते हैं। नयी सदी का पाठक ग्लोबल माइंड का है और भूमंडलीकरण, उदारतावाद, तकनीक, मीडिया, उपभोक्ता, मानवाधिकारवाद, पर्यावरणवाद, स्त्रीत्ववाद, दलितवाद उत्तर–आधुनिक विमर्श, उत्तर–संरचनावादी, चिन्ह, शास्त्रीय विमर्श इत्यादि तथा उनके नये–नये सन्दर्भों, उपयोगों को पढ़ना– समझना चाहता है। थियरीज के इसी ‘हाइपर रीयल’ में उसे पढ़ना होता है। साहित्य भी इस प्रक्रिया में बदल रहा है। प्ााठक भी। ‘वाक्’ इन तमाम नित नए विमर्शों से अपने नये पाठक को लैस करने का प्रयत्न है। ‘वाक्’ हिन्दी में पहली बार ‘परिसर रचना’ की अवधारणा प्रस्तुत कर रहा है।

सम्पादक :

सुधीश पचौरी

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मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखंडन और विखंडन में 'कामायनी'), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित, हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा 'साहित्यकार' का सम्मान आदि सम्मानों से पुरस्कृत मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी का जन्म उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ में हुआ । इन्होंने एम.ए. (हिन्दी) आगरा विश्वविद्यालय से तथा पीएच.डी.एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय से पूर्ण की । इनकी कुछ चर्चित पुस्तकों के नाम इस प्रकार हैं, मीडिया की परख, पॉपूलर कल्चर, भूमंडलीकरण, बाज़ार और हिन्दी,टेलीविजन समीक्षा : सिद्धान्त और व्यवहार, उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श, बिंदास बाबू की डायरी, फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति,हिंदुत्व और उत्तर-आधुनिकता, विभक्ति और विखंडन, निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद, जनतन्त्र और आतंकवाद, इत्यादि । वर्तमान में यह दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली में 'डीन ऑफ़ कॉलेजिज' हैं ।