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वर्तिका के बारे में....

बांग्ला के महान रचनाकार मनीष घटक द्वारा स्थापित और आजकल महाश्वेता देवी के सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका वर्तिका को हिन्दी में तब शुरू किया गया जब उदारीकरण और वैश्वीकरण की चुनौती अपने चरम पर थी। पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने पहले सिंगुर और उसके बाद नन्दग्रीाम में टाटा और सलेम ग्रुप को जमीन देने के लिए बरगादारों से जमीन अधिग्रहण के क्रम में न सिर्फ बल प्रयोग किया बल्कि क्रूरता की हद तक चले गये। दर्जनों लोग मारे गये और सैकड़ों घायल हुए। महाश्वेता देवी ने मुख्यमन्त्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की तुलना नरेन्द्र मोदी से कर डाली। उस बारे में हिन्दुस्तान अखबार में मेरा एक लेख छपा और उसे महाश्वेता देवी ने बांग्ला में अनुवाद कर न सिर्फ कोलकाता के अखबारों में छपवाया बल्कि उसका एक सभा में पाठ करवाया। इसी प्रसंग से सिंगुर और नन्दग्रीाम के संघर्ष को देश के दूसरे जमीनी संघर्षों से जोड़ कर हो रहे लेखन और साथ में चल रहे विमर्शों को एक संकलन के तौर पर प्रकाशित करने का फैसला हुआ। उदारीकरण विरोधी वही विमर्श वर्तिका का पहला अंक बना। उसके बाद वर्तिका वैश्वीकरण और उदारीकरण से असहमत राजनीतिक और सामाजिक मसलों पर केन्दि्रत एक मंच के तौर पर उभर कर आयी। उसमें किसानों और आदिवासियों की आवाज और वैकल्पिक विमर्श को लगातार स्थान दिया गया। यही वजह है कि उसका स्वरूप बांग्ला पत्रिका की तरह साहिति्यक और सांस्कृतिक न होकर राजनीतिक और सामाजिक बन कर उभरा। वह अभी तक एक मुद्दे को केन्दि्रत कर अपना विमर्श चलाती रही है और उसमें देश के प्रमुख बौदि्धकों की टिप्पणियों को समाहित किया जाता रहा है। वर्तिका की जरूरत इसलिए महसूस की गयी थी क्योंकि हिन्दी की मुख्यधारा के समाचार पत्र–पत्रिकाओं में तमाम राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को जनविरोधी तरह से प्रस्तुत करने की होड़ लगी हुई थी। बड़ी पूँजी के तमाम पत्र और चैनल वही भाषा बोल रहे थे जो कारपोरेट जगत चाहता है या उनका दलाल राजनीतिक वर्ग। उसके लिए उन्होंने अपने आधुनिकीकृत बौदि्धक ढूँढ़ लिए थे। ऐसे में महाश्वेता देवी के नेतृत्व में देश के बौदि्धकों और रचनाकारों के लिए एक ऐसे मंच की जरूरत है जो निर्भीक और निष्पक्ष तरीके से उन संघर्षों की चर्चा कर सके जो देश की जनता तमाम मोच्ार्ों पर कर रही है। पत्रिकाओं के भीड़ भरे बाजार में वर्तिका अलग खड़ी है और अपने साहस और प्रतिबद्धता के साथ। वह लोगों की पसन्द बन रही है क्योंकि समाज बेचैन है और वह बदलाव चाहता है। वह उन लोगों को जवाब देना चाहता है जो समाज और प्रकृति के संसाधनों को लूट रहे हैं और उन लोगों को सम्मान और जगह दिलाना चाहता है जो ल्ाम्बे समय से उपेकि्षत हैं। वही इस पत्रिका की ताकत हैं और हमारा लक्ष्य इसे उन तक पहुँचाना और उनके मुद्दों को निर्णय लेने वालों के दिमाग में उतारना है।

सम्पादकों के सन्दर्भ में.....

महाश्वेता देवी

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पद्मश्री, साहित्य अकादमी, मैग्सेसे, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों से सम्मानित बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926, ढाका में हुआ । वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं । उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रमाणिकता के साथ उभारा है । उन्होंने शोषण के विरुद्ध बार-बार आवाज़ बुलन्द की है ।

 

अरुण कुमार त्रिपाठी

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अरुण कुमार त्रिपाठी का जन्म 9 अक्टूबर, 1961 बस्ती (उत्तर प्रदेश) के एक किसान परिवार में हुआ । लखनऊ विश्वविद्यालय से एल-एल.एम. की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता से जुड़े । मानवाधिकार, दलित, स्त्री, पर्यावरण और आदिवासी आन्दोलनों से गहरा नाता । 'जनसत्ता' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक दशक तक पत्रकारिता करने के बाद 'हिन्दुस्तान' अखबार में संयुक्त सम्पादक और 'आज समाज' में सम्पादक (विकास) रहे । आजकल स्वतन्त्र लेखन में कार्यरत । वाणी प्रकाशन की 'आज के प्रश्न' श्रृंखला में नियमित लेखन । प्रकाशित कृतियाँ -'कल्याण सिंह', 'मेधा पाटकर' और 'कट्टरता के दौर में' ।