PREM SINGH

डॉ. प्रेम सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शिक्षक हैं। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में तीन वर्ष (1991-1994) तक फेलो रहते हुए हिन्दी और बंगला उपन्यास में क्रान्ति के विचार का अध्ययन किया है। अध्ययन का एक भाग 'क्रान्ति का विचार और हिन्दी उपन्यास' (2000) भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान से प्रकाशित है। आलोचना एवं राजनीतिक विश्लेषण की अन्य प्रकाशित पुस्तकें हैं : 'अज्ञेय : चिन्तन और साहित्य' (1987), 'निर्मल वर्मा : सृजन और चिन्तन' (संपा.) (1989), 'रंग-प्रक्रिया के विविध आयाम' (संपा.) (2007), 'साने गुरुजी साहित्य संकलन' (2008), ‘मधु लिमये : जीवन और राजनीति' (संपा.) (1996), 'कट्टरता जीतेगी या उदारता' (2004), 'उदारीकरण की तानाशाही' (2006)। इसके अलावा 'गुजरात के सबक' (2004, द्वितीय संस्करण 2009), 'जानिए योग्य प्रधानमन्त्री को' (2004), 'मिलिए हुकम के गुलाम से' (2009), 'संविधान पर भारी साम्प्रदायिकता' (2013) पुस्तिकाएँ प्रकाशित। दो कविता संग्रह ‘अभिशप्त जियो' (1982) और 'पीली धूप : पीले फूल' (1992) और एक कहानी संग्रह 'काँपते दस्तावेज़' (1982) भी प्रकाशित हैं। छात्र जीवन से ही समाजवादी आन्दोलन से जुड़े डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव हैं।

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