Suryapal Shukla

डॉ. सूर्यपाल शुक्ल दिसम्बर 1939 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव-बिनयका में जन्मे डॉ. सूर्यपाल शुक्ल एक स्वनिर्मित व्यक्तित्व के धनी, प्रबुद्ध शिक्षक रहे हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा अति सामान्य परिस्थितियों में संभव हो सकी थी। स्वभाव से अंतर्मुखी, मृदुभाषी एवं अध्यवसायी श्री शक्ल ने अपना कार्यक्षेत्र चना धर उत्तरपूर्व स्थित अरुणांचल प्रदेश को वहाँ के जनजीवन एवं प्राकृतिक सौंदर्य ने उन्हें इस कदर बाँधा कि वे वहाँ से कभी बाहर जाने को तैयार न हो सके, और गत 38 वर्षों से इसी प्रदेश में रमे रहे। उच्चशिक्षा के सभी आयामों-शिक्षण, प्रशासन, शोध, लेखन एवं ज्ञान के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपनी लगन, श्रम तथा प्रतिभा से, दक्षता का परिचय दिया। जियोमारफोलाजी तथा एप्लाएड जियोमारफोलाजी के क्षेत्र में उनके प्रामाणिक शोधग्रन्थों ने उन्हें देश एवं विशेषकर विदेशों में बड़ी ख्याति एवं मान प्रदान किया। उनका शोध क्षेत्र स्वाभाविक तौर पर पूर्वी हिमालय बना जिस पर उच्चकोटि के ग्रंथों का सर्वथा अभाव था। इस दृष्टि से उनका योगदान और भी महत्त्वपूर्ण लगता है। चार कहानियों एवं कुछ निबंधों के अलावा श्री शुक्ल जी ने हिंदी में बहुत कुछ नहीं लिखा है। वस्तुतः यह उनकी, हिंदी में, प्रथम रचना है। यह रचना भी उनके जीवन के एक विशेष कालखण्ड से संबंधित है। तथ्यों को प्रस्तुत करने की उनकी अपनी अलग शैली है। अपनी धरती की भीनी-भीनी गंध से ओतप्रोत एक भाषा है। आशा है कि श्री शुक्ल का यह प्रथम प्रयास सुधी पाठकों को अपनी निष्पक्ष मति प्रकट करने को प्रेरित कर पाएगा। संप्रति श्री शुक्ल अरुणांचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के सम्मानित सदस्य के रूप में कार्यरत हैं।

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