DR. NAMVAR SINGH

डॉ. नामवर सिंह डॉ. नामवर सिंह का जन्म 1 मई, 1927 को वाराणसी जिले के जीमनपुर नामक गाँव में हुआ। सम्पूर्ण शिक्षा वाराणसी में। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. (1951) और पीएच.डी. (1956); फिर उसी विश्वविद्यालय में 1956 ई. तक अध्यापन। चार वर्षों तक जोधपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर तथा अध्यक्ष। अल्पकाल के लिए क.मा.मु. हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक। 1974 से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली में भारतीय भाषा केन्द्र के संस्थापक अध्यक्ष तथा हिन्दी प्रोफ़ेसर रहे। साहित्यिक जीवन का आरम्भ कविता से हुआ और पत्र-पत्रिकाओं में कुछ कविताएँ प्रकाशित भी हुईं, किन्तु पहली प्रकाशित पुस्तक 'बकलम खुद' (1951) है जो व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का संग्रह है। हिन्दी शिक्षा जगत में सर्वप्रथम 'हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग' (1952) नामक पुस्तक से जाने गये जो मूलतः एम.ए. में लघु शोधप्रबन्ध के रूप में लिखी गयी थी। पीएच.डी. उपाधि के लिए स्वीकृत शोध प्रबन्ध है ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा' (1956)। शोध के अतिरिक्त मुख्य कार्यक्षेत्र है आधुनिक साहित्य की आलोचना। प्रमुख आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं-आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (1954), छायावाद (1955), इतिहास और आलोचना (1957), कहानी नयी कहानी (1964), कविता के नये प्रतिमान (1968), दूसरी परम्परा की खोज (1982) और वाद-विवाद संवाद (1990)। 'कविता के नये प्रतिमान' साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत है। 'शिक्षण-कार्य के अतिरिक्त दो वर्षों तक साप्ताहिक 'जनयुग' का सम्पादन किया और 1967 से त्रैमासिक 'आलोचना' का सम्पादन।

DR. NAMVAR SINGH