निराला संचयिता

Format:Paper Back

ISBN:81-7055-835-2

लेखक:रमेशचन्द्र शाह

Pages:414

मूल्य:रु195/-

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Rs.195/-

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निराला संचयिता

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निराला का कृतित्व इतना विपुल, वैचिध्यपूर्ण और साथ ही इतना युगातिकामी-निरन्तर प्रासंगिक सिद्ध हुआ है कि श्रेष्ठता या प्रातिनिधिकता, किसी भी दृष्टि से किया गया कैसा भी संकलन न तो विज्ञ पाठकों को, न स्वयं सम्पादक को ही सन्तुष्टि दे सकता है। बड़े कवित्व की एक कसौटी टी.एस. इलियट ने सुझाई थी : विपुलता, वैविध्य और पक्का-पूरा कर्मकौशल-जिस पर खरा उतरने वाले टेनीसन को उसने 'ग्रेट पोएट' ठहराया था। निराला का कृतित्व न केवल इस कसौटी पर ही खरा उतरता है, बल्कि उसे पीछे छोड़ते हुए अपने सम्यक् मूल्यांकन हेतु इससे कहीं उच्चतर कसौटी की माँग करता है। कुछ वैसी ही जैसी कॉलरिज ने अपने समानधर्मा कवि वर्ड्सवर्थ के मूल्यांकन के सिलसिले में अपने सामने रखी थी : 'रिकॉन्सिलियेशन ऑव अपोजिट्स' अर्थात् विरुद्धों का सामंजस्य। निराला की संवेदना जितनी विस्तृत और समावेशी है, उनकी भाषिक चेतना भी उतनी ही व्यापक है। वे अपने कवित्व को, कथाकारत्व को भी हिन्दी के समचे फैलाव में धड़कते महसूस करना चाहते हैं। लगता है, जैसे वे एक ओर तुलसीदास की अवधी से और दूसरी ओर रवीन्द्रनाथ की बंगला से टक्कर ले रहे हों। निराला ने गद्य को 'जीवन-संग्राम की भाषा' कहा है; किन्तु यह भाषा उनके पद्यात्मक कृतित्व यानी काव्य का भी अविच्छेद्य अंग है; और, दूसरी ओर उनके निपट गद्य में भी जिस तरह जगह-जगह सूक्तियाँ कौंध जाती हैं, जिस तरह कभी भी कहीं भी अचानक सतह से उठकर बहुत दूर-दूर की चीजें एक विद्युन्मय तीव्रता और त्वरा के साथ संयुक्त और प्रकाशित हो उठती हैं, वह निखालिस कवित्व का कमाल ही लगता है। निराला का विचार-प्रवण, आलोचनाप्रवण गद्य भी उनके उस कवित्व का ही अविच्छेद्य पक्ष है जो समग्र भारतीय अस्मिता की संवाहिका हिन्दी का, स्वयं निराला और उनके पट्टशिष्य डॉ. रामविलास शर्मा के मुहावरे में कहें, तो जातीय चेतना का, कवित्व था अपने भरे-पूरे अर्थ में मात्र सुधारकों, नीरंध्र परम्परावादियों या निरे साहित्यिकों से उनका भाव-बोध, उनका ज्ञानात्मक संवेदन किस कदर अलग, तीक्ष्ण और गहरा है, यह उनके लेखों-टिप्पणियों का मनन करके ही जाना जा सकता है।

About the writer

ED. RAMESH CHANDRA SHAH

ED. RAMESH CHANDRA SHAH रमेशचन्द्र शाह का जन्म (1937) अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में हुआ। आरम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एससी. तथा आगरा से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1997 में भोपाल के हमीदिया महाविद्यालय से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भोपाल स्थित ‘निराला सृजनपीठ’ के निदेशक रहे (दिसम्बर, सन् 2000 तक)। उपन्यास ‘पूर्वापर’ को भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता ने, ‘गोबरगणेश’ तथा काव्यकृति ‘नदी भागती आई’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने, आलोचना-पुस्तक ‘छायावाद की प्रासंगिकता’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने पुरस्कृत किया। उपन्यास ‘किस्सा गुलाम’ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। निबन्ध-संग्रह ‘स्वधर्म और कालगति’ को मध्यप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार प्रदान किया गया। श्री शाह को सन् 1987-88 में मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा ‘शिखर-सम्मान’ से सन् 2001 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा ‘व्यास-सम्मान’ से तथा सन् 2004 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया जा चुका है। प्रकाशित कृतित्व: ‘रचना के बदले’, ‘शैतान के बहाने’, ‘आडई़ का पेड़’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ (निबन्ध-संग्रह); ‘कछुए की पीठ पर’, ‘हरिश्चन्द्र आओ’, ‘नदी भागती आई’, ‘प्यारे मुचकुन्द को’, ‘देखते हैं शब्द भी अपना समय’, चुनी हुई कविताओं का संकलन ‘चाक पर’ वाग्देवी प्रकाशन पॉकेट बुक संस्करण में उपलभ्य, तीन बाल कविता-संग्रह तथा दो बाल-नाटक भी (कविता-संग्रह); ‘गोबरगणेश’, ‘किस्सा गुलाम’, ‘पूर्वापर’, ‘आखिरी दिन’; ‘पुनर्वास’, ‘आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू’, ‘असबाब-ए-वीरानी’ (उपन्यास); ‘मुहल्ले का रावण’, ‘मानपत्रा’, ‘थिएटर’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘एक लम्बी छाँह’ (यात्रा-संस्मरण); ‘छायावाद की प्रासंगिकता’, ‘समानान्तर’, ‘वागर्थ’, ‘भूलने के विरुद्ध’, ‘अज्ञेय: वागर्थ का वैभव’, ‘अज्ञेय का कवि कर्म’, ‘आलोचना का पक्ष’, दो साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ जयशंकर प्रसाद तथा अज्ञेय पर (समालोचना); ‘मेरे साक्षात्कार’ (साक्षात्कार); काव्यानुवादों की चार पुस्तिकाएँ ‘तनाव’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत प्रकाशित। ‘राशोमन’ नाटक का अनुवाद ‘मटियाबुर्ज’ नाम से (अनुवाद)। सम्पादन: प्रसाद रचना-संचयन तथा अज्ञेय काव्य-स्तबक (साहित्य अकादेमी), निराला-संचयन (महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए)। पता: एम-4, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल (म.प्र.)।

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