भारतीय उपमहद्वीप की त्रासदी

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-589-4

लेखक:

Pages:256

मूल्य:रु225/-

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डॉ. रज़ी अहमद की भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास पर नये सिरे से रोशनी डालती पुस्तक 'भारतीय उपमहाद्वीप की त्रासदी : सत्ता, साम्प्रदायिकता और विभाजन' गाँधीवादी आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों की संवेदनशीलता और हिन्दुस्तान के इतिहास और वर्तमान राजनीति पर उसके प्रभाव, इन विषयों पर डॉ. रज़ी अहमद के लिए क़लम उठाना चुनौतीपूर्णं रहा। घटनाओं को ऐतिहासिक वास्तविकताओं की रोशनी में निष्पक्षता से देखने की कोशिश है।

Additional Information

1857 के विद्रोह को सख़्ती से कुचल देने के बाद अंग्रेज़ों ने फ़ोर्टविलियम कॉलेज की सोची-समझी मेकाले-रणनीति के तहत बौद्धिक अस्त्र को अपनाया और यहाँ के लोगों की मानसिकता को बदलने के बहुआयामी अभियान चलाये और कुछ दिनों बाद ही वह अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब हुए। फ़ोर्टविलियम स्कूल के शिक्षित, दीक्षित और प्रोत्साहन प्राप्त लेखकों और इतिहासकारों ने अंग्रेज़ों की नपी-तुली नीतियों के तहत ऐसे काल्पनिक तथ्यों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रसारित-प्रचारित किया - जो ज़्यादातर तथ्यहीन थे। समय बीतने के साथ जो मानसिकता विकसित हुई, उस माहौल में ‘व्हाइट मेन्स बर्डन’ की साज़िशी नीति सफ़ल हो गयी। उन लेखकों और इतिहासकारों ने जो भ्रमित करते तथ्य परोसे, उनको सही मान लेने की वजह से हिंदुस्तानियों की दो महत्त्व्पूर्ण इकाइयों के बीच कटुता की खाई बढ़ती गयी। हिंदुस्तान पर क़बीलाई हमलों का सिलसिला बहुत लंबा रहा है। उसी क्रम में मुसलमानों के हमले भी हुए। उनकी कुछ ज़्यादतियाँ भी अवश्य रही होंगी, क्योंकि विश्व इतिहास का मध्यकालीन युग उसके लिए विख्यात है। उन हमलों की दास्तानों को प्राथमिकता देते हुए बुरी नीयत से खूब मिर्च-मसाला लगाकर पेश किया गया, जिसका नतीजा इस महाद्वीप के लिए अच्छा सिद्ध नहीं हुआ।

About the writer

DR. RAZI AHMAD

DR. RAZI AHMAD बिहार के वर्तमान बेगूसराय ज़िला के नूरपूर गाँव के एक मध्यवर्गीय शिक्षित परिवार में पले-बढ़े डॉ॰ रज़ी अहमद ने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास में एम॰ए॰ किया, फिर वहीं से पीएच॰डी॰ की उपाधि प्राप्त की। एम॰ए॰ करने के बाद 1960 से ही वह रचनात्मक क्षेत्र में सक्रिय होकर तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री डॉ॰ श्रीकृष्ण सिंह की अध्यक्षता में बिहार में गांधी संग्रहहालय निर्माण के लिए 1958 में बनी समिति की योजनाओं से सम्बद्ध रहे। बारह वर्षों (1980-1992) तक यह राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय, नयी दिल्ली के मंत्री भी रह चुके हैं। पाँच वर्षों तक ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ इंडिया चैप्टर, नयी दिल्ली, के सिक्रेटरी जेनरल भी रह चुके हैं। आपने 1978 में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य की हैसियत से यू॰एन॰ओ॰ में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया है। केन्द्रीय गांधी स्मारक निधि, नयी दिल्ली, राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय समिति, नयी दिल्ली, रजेन्द्र भवन ट्रस्ट, नयी दिल्ली, बिहार विरासत विकास न्यास, बिहार सरकार, सहित अनेक शैक्षणिक, रचनात्मक और मानवाधिकार के लिए संघर्षशील संस्थाओं की कार्य समितिऔर ट्रस्ट से सम्बद्ध हैं। पटना विश्वविद्यालय सहित कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक और सामाजिक संस्थानों ने इनके सराहनीय कार्यों के लिए इन्हें सम्मानित किया है। डॉ अहमद की अनेक छोटी पुस्तिकाओं के अतिरिक्त कई महत्त्व्पूर्ण पुस्तकें उर्दू, हिन्दी और अंग्रेज़ी में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनमें ‘सदाकत आश्रम’, ‘साम्प्रदायिकता एक चुनौती’, ‘गाँधी और मुसलमान’, ‘जयप्रकाश नारायण’, ‘आज़ादी के पचास वर्ष : क्या खोया क्या पाया’, गाँधी अमांग दी पीज़ेटस’ ने स्कोलर्स को आकर्षित किया है। देश और विदेशों में मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय समस्याओं तथा इस्लाम और विश्व्बंधुत्व जैसे विषयों पर आयोजित विचार गोष्ठियों में आप सम्मिलित होते रहे हैं।

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