पचास कविताएँ - गंगा प्रसाद विमल

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-356-2

लेखक:गंगा प्रसाद विमल

Pages:107

मूल्य:रु65/-

Stock:In Stock

Rs.65/-

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पचास कविताएँ - गंगा प्रसाद विमल

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बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में युवा कविता का जो स्वर उभरा था उसने कविता की दुनिया में देशव्यापी हलचल मचाई थी। आलोचना के खेमों में उस नव्यता को आत्मसात करने की क्षमता नहीं थी। यह तो उन प्रवादों ने स्पष्ट किया जो अकादमिक दुनिया के चटखारों तक सीमित रहे, वह उस कविता के वस्तु तत्त्व और विन्यास को नासमझी के स्तर पर व्याख्यायित करते रहे। जबकि सत्य यह था कि आधी शताब्दी के स्थापत्य के प्रति विश्वव्यापी असहमति युवा स्वरों में उभरनी आरम्भ हुई थी और उसके व्यापक अर्थ फ्रांस, चीन, पूर्वी एशिया के अतिरिक्त अमेरिका और अन्य राष्ट्रों की सृजनात्मक कोशिशों में प्रतिबिम्बित हुए थे। उन्हीं कोशिशों का एक हिस्सा हिन्दी का भी था और गंगा प्रसाद विमल एक सृजनशील कवि की तरह अपनी भूमिका निभाते रहे। उनकी आरम्भिक कविताएँ, जिनके कुछेक दृष्टान्त इस संचयन में संकलित हैं उन प्रवादों और फतवों से एकदम अलग हैं और शायद अलग होने का यही गुणधर्मी स्वभाव ऐसी कविताओं के प्रति आज भी आश्वस्ति जगाता है। अपने दूसरे कामों के साथ गंगा प्रसाद विमल कविता की दुनिया से न तो बेदखल हुए और न गुमनामी की दिशा में पहुँचे। चुपचाप अपने सृजन के प्रति समर्पण की इस रेखा को आगे बढ़ाते रहे बिना यह परवाह किए कि साहित्यिक शिविरों में उन्हें किस तरह अदेखा किया जा रहा है! अपने राजनैतिक रुझान का साहित्यिक फायदा उठाने की कोई कोशिश भी उनकी कविताओं का विषय नहीं है। यहीं से देखना उचित होगा कि आखिर अन्य विधाओं में काम करते-करते एक सर्जक फिर कविता की ओर क्यों मुड़ आता है? हमारे समय के अनेक कवियों ने इसके उत्तर अपनी कविताओं में प्रस्तुत किए हैं। मनुष्य जीवन के सन्ताप और त्रासदियाँ क्या जैसी घटित हुईं उन्हीं विवरणों में अपने उस चिरन्तन सत्य को संरक्षित करती हैं? या उनके भीतर प्रवेश कर यह देखना ज्यादा लाजिमी है कि आदमी के भीतर की पशुता को किस विवेक से परास्त किया जाय? कुछेक ऐसे सवाल हैं जिनके उत्तर वर्तमान व्यवस्थाओं के बूते के नहीं हैं। स्पष्ट है वह विवेक, वह दृष्टि मतवादों, फतवों और प्रवादों के घेरे से बाहर हैं। अपनी कविताओं में आम जनों से सम्बोधित ‘खैनी में खुश होते सत्तू में उत्सव मनाते’ लोगों को न भूलना ठीक वैसे ही जैसे ‘गपोड़े अन्तरिक्ष से’ पहाड़ बतियाते हैं। वे ‘भविष्य के लोगों’ से अनुरोध करते हैं कि जब तुम हत्यारों की सूची बनाओगे तो मुझे मत भूलना। उन्होंने स्पष्ट भी किया कि ‘ ‘न सही’ हत्याओं के वक्त हथियार हाथों में नहीं थे परन्तु उस उपेक्षा में तो शामिल थे जिसने हत्यारों को संपुष्ट किया’। गंगा प्रसाद विमल की कविताएँ सकारात्मकता की उन विरल छवियों को प्रस्तुत करती हैं जिसमें उद्वेग की जगह अनुद्वेग की उ$ष्मा है और वही उ$ष्मा बराबर रोशनी में रहने की आतुरता को ‘विजीविलिटी’ नहीं मानती क्योंकि अँधेरे की सन्तप्तता उजालों के अँधेरों में ही बोधगम्य होती है। नयी कविता, रागरंग, आधार जैसी पत्रिकाओं से अपनी यात्रा शुरू करने वाले विमल की कविताएँ वेस्टर्न ह्यूमैनिटीज रिव्यू, मेडिटिरेरियन रिव्यू, न्यू डायमेंशन आदि विश्वविख्यात पत्रिकाओं के साथ-साथ विश्व की अनेक अग्रणी भाषाओं में अनूदित हुई हैं और उनके अनेक संकलन अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित हुए हैं। अपनी कविताओं में प्रयोगधर्मी गुण के कारण ऐसा हुआ होगा या किसी अन्य कारण-इसकी पड़ताल अपेक्षित है।

About the writer

GANGAPRASAD VIMAL

GANGAPRASAD VIMAL जन्म : 3 जुलाई 1939, उत्तरकाशी (उत्तराखंड) भाषा : हिंदी विधाएँ : उपन्यास, निबंध, कविता, नाटक, अनुवाद मुख्य कृतियाँ कविता संग्रह : बोधि-वृक्ष, नो सूनर, इतना कुछ, सन्नाटे से मुठभेड़, मैं वहाँ हूँ, अलिखित-अदिखत, कुछ तो है कहानी संग्रह : कोई शुरुआत, अतीत में कुछ, इधर-उधर, बाहर न भीतर, खोई हुई थाती उपन्यास : अपने से अलग, कहीं कुछ और, मरीचिका, मृगांतक नाटक : आज नहीं कल आलोचना : प्रेमचंद, समकालीन कहानी का रचना विधान, आधुनिकता : साहित्य का संदर्भ संपादन : अभिव्यक्ति, गजानन माधव मुक्तिबोध का रचना संसार, अज्ञेय का रचना संसार, लावा (अंग्रेजी), आधुनिक कहानी, सर्वहारा के समूह गान, नागरी लिपि की वैज्ञानिकता, वाक्य विचार (उलत्सिफेरोव) अनुवाद : इतनो किछू, लिव्ज वेयर एंड अदर पोएम्स सम्मान पोयट्री पीपुल पुरस्कार, यावरोव सम्मान, आर्ट यूनिवर्सिटी, रोम का डिप्लोमा सम्मान, अन्तरराष्ट्रीय स्काटिश पोयट्री पुरस्कार, कल्पान्त पुरस्कार, भारतीय भाषा पुरस्कार, कुमार आशन पुरस्कार, संगीत अकादमी सम्मान, डॉ. अम्बेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान, साहित्यकार सम्मान, हिंदी उर्दू सम्मान, महाराष्ट्र भारती सम्मान, अन्तरराष्ट्रीय सर्वोच्च बल्गारियाई सम्मान

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