दक्षिण-पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-768-3

लेखक:डॉ. फणीश सिंह

Pages: 156

मूल्य:रु395/-

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Rs.395/-

Details

दक्षिण-पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव भारत में इतिहास का पाठ्यक्रम पश्चिमोन्मुखी रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया का इतिहास हमारी प्राथमिकता में नहीं है। इस विसंगति की गम्भीरता ज्यादा बढ़ जाती है, जब हम पाते हैं दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के इतिहास का सम्बन्ध भारतीय इतिहास से काफी निकट का रहा है। इस क्षेत्रा में भारत की बहुआयामी उपस्थिति ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों से ही प्रारम्भ हो गयी। सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में भारतीय हस्तक्षेप से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के तत्कालीन जीवन में मौलिक परिवर्तन आया। भारत के साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के सभी क्षेत्रों का सम्बन्ध एक समान नहीं था। यह प्रक्रिया भारत के अन्दर मुख्य धारा और क्षेत्राीय धाराओं के अन्तःसम्बन्धों जैसी ही थी। भारतीय सामाजिक व्यवस्था का गहरा प्रभाव दक्षिण-पूर्वी एशिया पर पड़ा। परन्तु यहाँ जाति व्यवस्था पर बल नहीं दिया गया। संस्कृत भाषा को स्थानीय संस्कृतियों ने आत्मसात किया एवं कुछ श्रेष्ठ संस्कृत अभिलेख इसी क्षेत्रा में रचे गये। दक्षिण-पूर्व एशिया में कई स्थानों का नामकरण भारतीय नगरों के आधार पर पड़ा। उदाहरण के लिए थाइलैंड की प्राचीन राजधानी का नाम अयुथ्या था, जो स्पष्टतया अयोध्या से लिया गया। इस क्षेत्रा में बौद्ध धर्म और पौराणिक धर्म का एक दिलचस्प सम्मिश्रण विकसित हुआ, जिसका उत्कर्ष कम्बोडिया के अंगकोरवाट और बेयोन में तथा जावा के बोरोबुदूर स्तूप और प्रमनन मन्दिर में देखने को मिलता है। प्रस्तुत पुस्तक किसी पेशेवर इतिहासकार द्वारा नहीं लिखी गयी है। यह भी सच है कि मौलिक एवं महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक रचनाएँ अकादमिक इतिहासकारों द्वारा नहीं लिखी गयी हैं। श्री फणीश सिंह पेशे से वकील हैं और स्वभाव से घुमक्कड़। इनकी घुमक्कड़ी में एक गहरे इतिहास-बोध का भी संयोग है। यही कारण है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया के विभिन्न देशों का भ्रमण करते समय न केवल इन्होंने सभी दर्शनीय पुरातात्त्विक महत्त्व के स्थलों का दर्शन किया बल्कि इन स्थलों पर उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों पर भी एक गहरी नजर डाली है। यात्रा-वृत्तान्त की शैली में रचित इस पुस्तक में ऐतिहासिक तथ्य बड़े ही दिलचस्प ढंग से उभर कर सामने आते हैं। न ऐतिहासिक तथ्यों की प्रामाणिकता से कहीं कोई समझौता होता है और न ही पाठकों को ऐतिहासिक तथ्यों की बोझिलता का एहसास होता है। मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक दक्षिण-पूर्व एशिया एवं भारत के ऐतिहासिक सम्बन्धों में एक नयी दिलचस्पी पैदा करने में सफल होगी। डॉ. विजय कुमार चौधरी

Additional Information

डॉ. फणीश सिंह जन्म 15 अगस्त, 1941 को ग्राम नरेन्द्रपुर, जिला सिवान (बिहार) में एक जश्मींदार परिवार में। 15 वर्ष की आयु में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से ‘विशारद’ की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् एम.ए. तथा बी.एल. करने के बाद पटना उच्च न्यायालय में अगस्त 1967 में वकालत आरम्भ की। छात्रा जीवन से ही हिन्दी साहित्य से अनुराग था और अनेक लेख विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। भारतीय प्रतिनिधि के रूप में 1983 में मॉस्को और 1986 में कोपनहेगेन विश्व-शान्ति सम्मेलन में शामिल हुए। भारत सोवियत संघ की पाँच बार यात्रा की। विश्व-शान्ति परिषद् के विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए डेनमार्क, स्वीडन, इस्टोनिया, पोलैंड, जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रिया, इंग्लैंड, अमरीका और पुनः जर्मनी की यात्रा की। सन् 2006 में अखिल भारतीय शान्ति एवं एकजुटता संगठन के प्रतिनिधि-मण्डल के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा की। आपने हाल ही में टर्की, पुर्तगाल, ग्रीस, स्पेन, हंगरी, हॉलैंड, बेल्जियम, स्काटलैंड एवं पुनः इंग्लैंड की यात्रा की। दक्षिण-पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति के प्रभाव के अध्ययन के सिलसिले में म्यांमार, थाइलैंड, लाओस, वियतनाम, कम्बोडिया, इंडोनिसिया (बाली), मलेशिया, सिंगापुर, मालदीव, श्रीलंका, फिलीपिंस एवं बोर्नियो की यात्रा कर चुके हैं। अपनी दसवीं यूरोपीय यात्रा के क्रम में हाल में ही फिनलैंड, हंगरी, बुल्गारिया, मैसिडोनिया एवं सर्बिया की यात्रा की। भारतीय सांस्कृतिक सम्बद्ध परिषद (प्ण्ब्ण्ब्ण्त्ण्) के सलाहकार सदस्य। 1984 में ही पूर्वी जर्मनी के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च सम्मान द्वारा सम्मानित। आपने हिन्दी साहित्य के इतिहास और विभिन्न विदेशी भाषाओं की कहानियों का विशेष अध्ययन किया। गोर्की और प्रेमचन्द के कृतित्व और जीवन-दृष्टिकोणों की सादृश्यता से दोनों पर शोध कार्य की प्रेरणा ली और इस विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पहली पुस्तक ‘प्रेमचन्द एवं गोर्की का कथा-साहित्य: एक अध्ययन’ दिसम्बर 2000 में प्रकाशित हुई। अब तक इनकी 12 पुस्तकें हिन्दी साहित्य के विभिन्न विषयों एवं स्वाधीनता आन्दोलन पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

About the writer

Dr. Fanish Singh

Dr. Fanish Singh डॉ. फणीश सिंह जन्म 15 अगस्त, 1941 को ग्राम नरेन्द्रपुर, जिला सिवान (बिहार) में एक जश्मींदार परिवार में। 15 वर्ष की आयु में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से ‘विशारद’ की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् एम.ए. तथा बी.एल. करने के बाद पटना उच्च न्यायालय में अगस्त 1967 में वकालत आरम्भ की। छात्रा जीवन से ही हिन्दी साहित्य से अनुराग था और अनेक लेख विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। भारतीय प्रतिनिधि के रूप में 1983 में मॉस्को और 1986 में कोपनहेगेन विश्व-शान्ति सम्मेलन में शामिल हुए। भारत सोवियत संघ की पाँच बार यात्रा की। विश्व-शान्ति परिषद् के विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए डेनमार्क, स्वीडन, इस्टोनिया, पोलैंड, जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रिया, इंग्लैंड, अमरीका और पुनः जर्मनी की यात्रा की। सन् 2006 में अखिल भारतीय शान्ति एवं एकजुटता संगठन के प्रतिनिधि-मण्डल के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा की। आपने हाल ही में टर्की, पुर्तगाल, ग्रीस, स्पेन, हंगरी, हॉलैंड, बेल्जियम, स्काटलैंड एवं पुनः इंग्लैंड की यात्रा की। दक्षिण-पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति के प्रभाव के अध्ययन के सिलसिले में म्यांमार, थाइलैंड, लाओस, वियतनाम, कम्बोडिया, इंडोनिसिया (बाली), मलेशिया, सिंगापुर, मालदीव, श्रीलंका, फिलीपिंस एवं बोर्नियो की यात्रा कर चुके हैं। अपनी दसवीं यूरोपीय यात्रा के क्रम में हाल में ही फिनलैंड, हंगरी, बुल्गारिया, मैसिडोनिया एवं सर्बिया की यात्रा की। भारतीय सांस्कृतिक सम्बद्ध परिषद (प्ण्ब्ण्ब्ण्त्ण्) के सलाहकार सदस्य। 1984 में ही पूर्वी जर्मनी के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च सम्मान द्वारा सम्मानित। आपने हिन्दी साहित्य के इतिहास और विभिन्न विदेशी भाषाओं की कहानियों का विशेष अध्ययन किया। गोर्की और प्रेमचन्द के कृतित्व और जीवन-दृष्टिकोणों की सादृश्यता से दोनों पर शोध कार्य की प्रेरणा ली और इस विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पहली पुस्तक ‘प्रेमचन्द एवं गोर्की का कथा-साहित्य: एक अध्ययन’ दिसम्बर 2000 में प्रकाशित हुई। अब तक इनकी 12 पुस्तकें हिन्दी साहित्य के विभिन्न विषयों एवं स्वाधीनता आन्दोलन पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

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