भारतीय भाषाओं में रामकथा: कन्नड़ भाषा

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-053-6

लेखक:प्रो. टी.आर. भट्ट

Pages:98

मूल्य:रु225/-

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Rs.225/-

Details

भारतीय संस्कृति के विभाजन को केन्द्र में रखते हुए भारतीय भाषाओं एवं राज्यों को पृथक्-पृथक् खंडों में बाँटने वाले विदेशी राजतन्त्रों के कारण भारत बराबर टूटते हुए भी, अपने सांस्कृतिक सन्दर्भों के कारण, अब भी एक सूत्र में बँधा है। एकता के सूत्र में बाँधने वाले सन्दर्भों में राम, कृष्ण, शिव आदि के सन्दर्भ अक्षय हैं। भारतीय संस्कृति अपने आदिकाल से ही राममयी लोकमयता की पारस्परिक उदारता से जुड़ी सम्पूर्ण देश, उसके विविध प्रदेशों एवं उनकी लोक व्यवहार की भाषाओं में लोकाचरण एवं सम्बद्ध क्रियाकलापों से अनिवार्यतः हजारों-हजारों वर्षों से एकमेव रही है। सम्पूर्ण भारत तथा उसकी समन्वयी चेतना से पूर्णतः जुड़ी इस भारतीय अस्मिता को पुनः भारतीयों के सामने रखना और इसका बोध कराना कि पश्चिमी सभ्यता के विविध रूपों से आक्रान्त हम भारतीय अपनी अस्मिता से अपने को पुनः अलंकृत करें। भारतीय भाषाओं में रामकथा को जन-जन तक पहुँचाने का यह हमारा विनम्र प्रयास है। कन्नड़ में रामकथा की भरमार का मुख्य कारण यह रहा है कि कन्नड़ प्रदेश विभिन्न धार्मिक सन्तों की कर्मभूमि रही है। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य एवं शंकराचार्य आदि ने यहाँ अपने मतों का खूब प्रचार किया और विशेष रूप में आचार्य मध्वाचार्य एवं वैष्णव मत का खूब प्रचार-प्रसार यहाँ रहा है। इसलिए रामकथा को लोगों की अधिक स्वीकृति मिल गयी और राम पूर्ण रूप से यहाँ लोकजीवन और लोकमानस में घुल-मिल और समा गये हैं।

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PRO.T.R. BHATT

PRO.T.R. BHATT जन्म तिथि: 29 अक्टूबर, 1944 पूर्व प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ शिक्षा: एम.ए., पीएच.डी. (हिन्दी); डिप्लोमा इन फ्रेंच, डिप्लोमा इन ट्रान्सलेशन। प्रकाशित कृतियाँ: ‘पन्त और बेन्द्रे की काव्य-चेतना’ (शोध-प्रबन्ध), ‘हिन्दी-कन्नड़ साहित्य: दशाएँ और दिशाएँ’, ‘सौन्दर्य मीमांसा’, ‘शम्बूक और शूद्र तपस्वी: एक मूल्यांकन’, ‘कवि मनीषी विनायक गोकाक’, ‘कन्नड़ की रामकाव्य-परम्परा’ (आलोचना), ‘नदी के साथ बहते’, ‘कावेरी से सागर तक’ (काव्य संग्रह), ‘फ्रेंच कलियिरि’ (फ्रेंच सीखिए), ‘दक्षिण का रंगमंच’(सम्पादित)। सम्मान एवं पुरस्कार ः मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा ‘कवि मनीषी विनायक गोकाक’ पर हिन्दीतर भाषी लेखक पुरस्कार (1993), उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ का ‘सौहार्द सम्मान’(1999), ‘अखिल भारतीय हिन्दी सेवी सम्मान’ 2011 का ‘गंगाशरण सिंह पुरस्कार’, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से अगस्त 2011 में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा प्रदत्त पुरस्कार। सम्पर्क: ‘प्रज्ञाश्री’, छठा क्रास, कल्याणनगर, धारवाड़-580007 (कर्नाटक) मो.: 09449634716 ई-मेल: trbhatdwd@gmail.com

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