रवीन्द्रनाथ त्यागी रचनावली (1 से 8 खण्ड सेट )

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-514-2

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मूल्य:रु8000/-

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Rs.8000/-

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‘‘आज के वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य लेखकों में रवीन्द्रनाथ त्यागी का लेखन अपने ढंग का है। उस पर पूर्ववर्ती तथा समकालीन लेखकों का कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं होता। उन्होंने लगभग स्वतन्त्रा रूप में अपना लोकतन्त्रा विकसित किया है। उनकी कलात्मक अभिरुचियाँ परिष्कृत और साहित्य का अध्ययन गहन है। वह उनके लेखन में उसे सम्पन्न बनाते हुए बोझिल होने से बचाते हुए सहज रूप में प्रतिबिम्बित होता है। त्यागीजी में राजनीतिक तल्खी नहीं है, वहाँ सहज परिहास-बोध है और स्थितियों का विश्लेषण तथा कौतुकपूर्ण सूझ-बूझ है। कहना न होगा कि रवीन्द्रनाथ त्यागी का साहित्य सुशिक्षित व सुसंस्कृत व्यंग्य व परिहास का अद्वितीय नमूना है...। ’’ -श्रीलाल शुक्ल ‘‘मैं रवीन्द्रनाथ त्यागी को एक श्रेष्ठ कवि और श्रेष्ठ व्यंग्यकार स्वीकार करता हूँ। उनकी विशिष्टता का एक प्रमुख कारण है कि हमारे जो पुराने क्लासिकल हैं, उनमें उनकी गति है। वे सचमुच बहुत अच्छा लिखते हैं। ऐसा प्रवाहमय विट सम्पन्न गद्य मुझसे लिखते नहीं बनता...। ’’ -हरिशंकर परसाई ‘‘तलवार चलाते हैं, शरद जोशी के हाथ में गुलेल और रवीन्द्रनाथ त्यागी के पास शब्दों के नश्तर हैं, जिनसे वे महीन मार करते हैं। सूरदास में वात्सल्य-पदों की भाँति उनको बार-बार पढ़ने पर भी नयेपन का बोध होता है...’’ -मनोहरलाल ‘‘जिन लोगों ने व्यंग्य को स्वतन्त्रा प्रतिष्ठा देने-दिलाने की दिशा में काम किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ त्यागी का अपना अलग रंग है। उनकी खास बात उनकी उन्मुक्तता और लालित्य है। हिन्दी में इस तरह बिना किसी प्रकट और प्रत्यक्ष उद्देश्य के (निष्प्रयोजन और अहेतुक नहीं) लेखन की परम्परा बहुत विकसित नहीं है। शब्दों और विचारों से खिलवाड़-कौतुक के स्तर पर लेखन हिन्दी में विरल है। त्यागी जी में वह ज़िन्दादिली और मस्ती या बेफिश्करी है कि उनके लेखन को उन्मुक्त लेखन का दर्जा आसानी से दिया जा सकता है। इसीलिए उनका नाम इस विधा में स्थायी महत्त्व का हो जाता है...’’ -धनंजय वर्मा

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About the writer

Kamal Kishore Goyanka

Kamal Kishore Goyanka प्रेमचन्द के जीवन, साहित्य, विचार तथा पाण्डुलिपियों के अध्ययन, अनुसंधान और आलोचना को आधी शताब्दी अर्पित करने वाले, इनके सम्बन्ध में सर्वथा नवीन अवधारणाओं के संस्थापक तथा उनकी भारतीयतावादी समग्र मूर्ति के अन्वेषक तथा देश-विदेश में ‘प्रेमचन्द स्कॉलर’ के रूप में विख्यात; प्रेमचन्द पर तथा अन्य हिन्दी लेखकों पर 27 पुस्तकें प्रकाशित। कुछ प्रमुख पुस्तकें: ‘प्रेमचन्द के उपन्यासों का शिल्प-विधान’; ‘प्रेमचन्द: विश्वकोश’ खंड-2); ‘प्रेमचन्द: अध्ययन की नई दिशाएँ’; ‘प्रेमचन्द: चित्रात्मक जीवनी’; ‘प्रेमचन्द का अप्राप्य साहित्य’ खंड-2); ‘प्रेमचन्द: अनछुए प्रसंग’; ‘प्रेमचन्द: वाद, प्रतिवाद और संवाद’; ‘प्रेमचन्द: कहानी रचनावली’ खंड-6); ‘प्रेमचन्द की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन’; ‘गाँधी: पत्राकारिता के प्रतिमान’; ‘हिन्दी का प्रवासी साहित्य’; ‘प्रेमचन्द: कालजयी कहानियाँ’। दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होकर साहित्य-साधना में संलग्न। वर्तमान में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष पद पर हैं।

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