ग्रियर्सन : भाषा और साहित्य चिन्तन

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-87889-33-0

लेखक:

Pages:296

मूल्य:रु695/-

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जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (डबलिन, आयरलैंड, 1851-1941) बहुभाषाविद् और आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले पहले भाषावैज्ञानिक थे। वे 1870 के लगभग आई.सी.एस. होकर भारत आये। वे बंगाल और बिहार के कई उच्च पदों पर 1899 तक कार्यरत रहे। फिर वापस आयरलैंड चले गये। भारत में रहते हुए ग्रियर्सन ने कई क्षेत्रों में काम किया। तुलसीदास और विद्यापति के साहित्य का महत्त्व प्रतिपादित करनेवाले वे सम्भवतः पहले अंग्रेज विद्वान थे। हिन्दी क्षेत्र की बोलियों के लोक साहित्य (गीत-कथा) का संकलन और विश्लेषण करनेवाले कुछेक विद्वानों में भी ग्रियर्सन अग्रिम पंक्ति के विद्वानों में थे। आलोचना और वैचारिक चिन्तन के क्षेत्र के सुपरिचित आलोचक अरुण कुमार ने ग्रियर्सन के भाषा और साहित्य के अनेक पक्षों को उभारा है साथ ही उनकी सीमा या कहें बुनियादी मकसद को भी सामने रखा है। लेखक के अनुसार हिन्दी प्रदेश को बाँटने और उसे एक न मानने के पीछे ग्रियर्सन की समझ काम कर रही थी। आश्चर्य यह कि बिहार में रहकर उनकी भाषिक समझ लगभग ब्रिटिश राज की दृष्टि से भिन्न नहीं थी जबकि कश्मीर से लेकर पाक स्थित उत्तर-पश्चिमी प्रान्त अफष्गशनिस्तान की पश्तो भाषा आदि के विषय में ग्रियर्सन की दृष्टि कमोबेश सन्तुलित और प्रासंगिक थी। लेखक कुमार ने ऐसे अनेक आयामों को समझा और उनका विश्लेषण किया है।

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Arun Kumar

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