भाषाई अस्मिता और हिन्दी

Format:Paper Back

ISBN:978-81-7055-241-3

लेखक:

Pages:228

मूल्य:रु195/-

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भाषाई अस्मिता और हिन्दी

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भाषा किसी भी भाषाई समुदाय के सदस्यों को अन्दरूनी तौर पर जोड़ने और बाँधने वाली एक जबर्दस्त ताकत के साथ-साथ एक संगठित समुदाय में अलगाव और बिखराव पैदा करने वाला एक हथियार भी है। भाषा में जोड़ने और तोड़ने वाली ताकत एक ही चीज़ के दो पहलू हैं, और वह चीज़ है सामाजिक अस्मिता। हिन्दी न तो मात्र व्याकरण और न ही वह केवल विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह सामाजिक संस्था भी है, संस्कृति के रूप में वह सामाजिक प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परम्परा भी है। इस पुस्तक में संकलित लेखों में सामाजिक अस्मिता और भारतीय बहभाषिकता के सन्दर्भ में हिन्दी भाषा के कुछ। ऐसे पहलू पर विचार किया गया है जो एक ओर विद्वानों के लिए बहस के मद्दे बने हुए हैं और दूसरी ओर हमारी। भाषा-नीति पर आज प्रश्नचिह्न बने हुए हैं।

About the writer

RAVINDRANATH SRIVASTAVA

RAVINDRANATH SRIVASTAVA रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग में सम्प्रति वरिष्ठतम प्रोफ़ेसर रहे हैं। लेनिनग्राद विश्वविद्यालय (सोवियत संघ) से भाषाविज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि के बाद पोस्ट-डॉक्टरेट शोध के लिए अमेरिका गये। वे यूनेस्को और यूनाइटेड नेशन्स की भाषा समितियों में विशेषज्ञ के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने अमेरिका और इटली के विश्वविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में अध्यापन किया है। उनकी पाँच पुस्तकें और अंग्रेजी, रूसी और हिन्दी में कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं। विशेषज्ञता : अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, समाजभाषा विज्ञान, संकेतविज्ञान, शैली विज्ञान और प्रजनन स्वन विज्ञान।

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