दलित और प्रकृति

Format:Paper Back

ISBN:978-93-8956-366-5

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Pages:336

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दलित और प्रकृति

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प्रस्तुत पुस्तक का विषय है भारत में प्रकृति और पर्यावरण की चर्चा में जाति और दलित का समावेश और पर्यावरण अध्ययन में पहली बार जाति, सत्ता, ब्राह्मणवाद और दलित स्वर के जटिल अन्तःसम्बन्धों की खोज-पड़ताल। पुस्तक तीन प्रकार से पर्यावरण में जाति जंजाल और दलित दृष्टिकोण खोजने की कोशिश करती है। पहला, आधुनिक भारत के पर्यावरणवाद की कुछ मज़बूत धाराओं में ब्राह्मणवाद की गहरी पैठ। दूसरा, दलितों के अब तक अनदेखे-अनजाने पर्यावरण, स्वर और विचार पर ध्यान जो उनके ऐतिहासिक, मिथकीय, वैचारिक और तार्किक अतीत और वर्तमान से ज़ाहिर होता है। और तीसरा, दलित, उनके संगठन और सक्रियता से एक अलग पर्यावरण संवेदना और समझ की पहचान जो निश्चित तौर पर प्राकृतिक संसाधनों की नयी संकल्पनाओं के रूप में उभरती है। पुस्तक इन तीनों धाराओं को एक-दूसरे से गूँथकर देखती है और दलितों की पर्यावरण समझ को भारतीय पर्यावरणवाद में निहित तनाव और भावी चुनौतियों के रूप में समझती है। पुस्तक मौका-ए-अध्ययन के ज़रिये दर्शाती है कि किस प्रकार देश की पर्यावरण राजनीति जाति-वर्चस्व का वरण करती है। और स्वच्छता और शौच पर काम करने वाले कुछ प्रमुख पर्यावरणीय संगठन और सोच ‘पर्या-जातिवरण' के तहत दलितों की मुक्ति और पुनरुत्थान के लिए नवहिन्दुत्ववाद का जाला बुनते हैं जिसमें ब्राह्मणवाद के स्वरूप और नेतृत्व की जय-जयकार होती है। देश के कई हिस्सों में प्रचलित विविध सांस्कृतिक विधाओं, लोकाचारों, लोकप्रिय संस्कृतिकर्मियों और उपलब्ध साहित्य के शोध के आधार पर पुस्तक में दलितों की पर्यावरण संचेतना को सघनता से चिह्नित किया गया है। साथ ही, जाति-विरोधी जाने-माने विचारकों और राजनीतिकर्मियों-पेरियार, फुले, अम्बेडकर के विचारों और कार्यों को पर्यावरण झरोखों से देखा गया है। ख़ासकर, देश की पर्यावरणीय विचार परम्परा में अम्बेडकर की प्रासंगिकता का गम्भीर विश्लेषण है। पुस्तक में पारम्परिक पर्यावरणवाद और उसकी अकादमिक अभिव्यक्ति से अलग पानी, जंगल, सामूहिक संसाधन, पर्वत, जगह, आदि पर दलितों और उनके संघर्षों से शक्ल लेने वाले नये पर्यावरणवाद की ज़मीनी समीक्षा की गयी है जो पर्यावरण और सामाजिक आन्दोलनों के लिए नयी सम्भावनाएँ रचती है। पुस्तक का निष्कर्ष है कि जैसे दुनिया में लिंग, नस्ल, आदिवासियत के शुमार से पर्यावरण राजनीति समृद्ध हुई है, वैसे ही जाति और दलित के मूल्यांकन से भारत के पर्यावरण संगठन और आन्दोलन को मज़बूती मिलेगी।

About the writer

Mukul Sharma

Mukul Sharma मुकुल शर्मा अशोक विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग में प्रोफेसर हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय जन संचार संस्थान, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स, आदि में राजनीति विज्ञान, पर्यावरण, श्रम, संचार और मानव अधिकार विषयों पर अध्ययनअध्यापन और शोध कार्य किया है। वो डेढ़ दशक तक हिन्दी में पेशेवर पत्रकार रहे और उन्हें पत्रकारिता के लिए कई राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सम्मान मिले। कई राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संगठनों-एमनेस्टी इंटरनेशनल, एक्शन ऐड, हेनरिख बॉल फाउंडेशन, क्लाइमेट पार्लियामेंट, आदि-में भारत, दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में बरसों काम किया। हिन्दी और अंग्रेज़ी में उनकी 16 पुस्तक-पुस्तिकाएँ प्रकाशित हैं। प्रमुख पुस्तकें : कास्ट एंड नेचर : दलित एंड इंडियन एनवायर्नमेंटल पॉलिटिक्स, ग्रीन एंड सैफरन : इंडियन नेशनलिज्म, ह्यूमन राइट्स इन अ ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड : ए इंडियन डायरी और समाचार-पत्र और साम्प्रदायिकता। आजकल दक्षिण एशिया में 'पर्यावरण, पवित्रता, धार्मिकता और राजनीति' पर शोध।

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