भाषा चिन्तन हिन्दी

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8901-294-1

लेखक:

Pages:86

मूल्य:रु300/-

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Rs.300/-

Details

भाषा चिन्तन हिन्दी

Additional Information

भाषा के बारे में लोग क्या सोचते हैं, यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। किसी भी उदीयमान देश के लिए भाषा की उपयोगिता को समझना देश की होने वाली प्रगति का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। भाषा के महत्व को समझने का आधार भावुकता नहीं, अपितु रोज की ज़िन्दगी में उसकी उपयोगिता है। भाषा के माध्यम से ही हम अपने विचारों, भावों, अपने शोध के निष्कर्षों और अपनी महत्वाकांक्षाओं को अभिव्यक्त करते हैं। भाषा के विषय में भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में ऐतिहासिक, सामाजिक व राजनीतिक दृष्टि से और भाषा के स्वरूप की दृष्टि से भाषा के अनेक पहलू हैं जिन पर विद्वान अपने शोध के आधार पर समय-समय पर लिखते रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक उन्हीं विचारों का निचोड़ है। उन्हीं विचारों को लिखते हुए लेखक ने अपने शोध और अपने चिन्तन के आधार पर भी हिन्दी भाषा के अनेक पहलुओं की चर्चा इस पुस्तक में की है। हिन्दी भाषा की कुछ अपनी भाषागत विशेषताएँ हैं जिनको इस पुस्तक में उजागर किया गया है। उदाहरण के लिए हिन्दी भाषा में औपचारिक शब्दावली और अनौपचारिक शब्दावली में जो अन्तर दिखाई पड़ता है। उतना अन्तर अंग्रेज़ी में नहीं दिखता। हिन्दी व अंग्रेज़ी का सम्मिश्रण, जो आज हिन्दी भाषियों की बोलचाल में दिखाई पड़ता है, उसका प्रयोगकर्ताओं की दोनों भाषाओं में प्रवीणता पर क्या असर पड़ता है और एक सशक्त समाज और एक सशक्त भाषा का साहचर्य कितना आवश्यक है-आदि विषयों पर नपे तुले शब्दों में यहाँ चर्चा है। आशा है यह पुस्तक भाषा सम्बन्धी विषयों पर पाठकों के विचारों में स्पष्टता ला सकने में कुछ योगदान कर सकेगी और समाज में भाषा सम्बन्धी चर्चा को वैज्ञानिक ढंग से आगे बढ़ा सकेगी।

About the writer

Dr. Surendra Gambhir

Dr. Surendra Gambhir लेखक डॉ. सुरेन्द्र गम्भीर अमरीका में यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेन्सिल्वेनिया में पिछले अनेक वर्षों से अध्यापन कार्य में रत हैं । आप यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कांसिन और कारनेल यूनिवर्सिटी में भी पढा चके हैं। यनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वेनिया में ही आपने भाषा-विज्ञान का प्रशिक्षण प्राप्त करके वहाँ से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। समाज में भाषा के स्थान को लेकर आपका गहरा चिन्तन रहा है। भारत में हिन्दी, हिन्दी-अंग्रेजी सम्बन्ध और भारत से बाहर हिन्दी और भोजपरी के विषय में आपने बहुत कुछ लिखा है। अनेक वर्षों से आप शोध-कार्य में व्यस्त हैं। आपने दक्षिणी अमरीका के देश गयाना, सूरीनाम, कैरिबियन समुद्र के बीच स्थित द्वीप त्रिनीदाद-तोबैगो, हिन्द महासागर में स्थित मॉरीशस और अमरीका आदि देशों में जगह-जगह घूम कर भारतीय मूल के निवासियों से बातचीत और शोध के लिए अनेक प्रकार की सामग्री एकत्र की है। भारत में भी बिहार और उत्तर प्रदेश के अनेक गाँवों में आपने कन्धे पर टेपरिकार्डर लटकाए लोगों की भाषा और भाषा के बारे में उनके विचारों को उनकी भाषा के नमूनों को टेपबद्ध किया। इस समग्र सामग्री का समय-समय पर विश्लेषण अनेक लेखों और पुस्तकों के रूप में सामने आता रहा है। उसी शृंखला में यह पुस्तक भी प्रस्तुत है।

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