अनभै साँचा

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-944-4

लेखक:

Pages:300

मूल्य:रु495/-

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Rs.495/-

Details

अनभै साँचा

Additional Information

अनभै साँचा सुपरिचित हिन्दी आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय के आलोचनात्मक लेखन का एक चयन है जिसमें उनके गत तीस वर्षों के महत्त्वपूर्ण निबन्धों को संकलित किया गया है। इस चयन में पाठक देखेंगे कि भक्तिकाव्य की पुनर्मीमांसा से लेकर आलोचना और इतिहास के अन्तःसम्बन्ध और रचना के स्तर पर उनकी चिन्ताओं का विश्लेषण, उपन्यास के समाजशास्त्रीय अध्ययन की प्रवृत्तियों के अनुशीलन के साथ-साथ उपन्यास की सामाजिकता के विश्लेषण की आवश्यकता का निरूपण, हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना की सीमाओं और सम्भावनाओं का पर्यवेक्षण, समकालीन हिन्दी कविता की चुनौतियों और उससे उबरने के सूत्रों का विवेचन तो है ही, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, कुमार विकल और वरवर राव की कविताओं का सम्यक परीक्षण भी है। इन कवियों पर विचार करते हए प्रो. पाण्डेय ने समकालीन कविता को देखने-परखने के कई निकष दिए हैं जिनमें जनशक्ति में आस्था, जीवन-संघर्ष के प्रति राग, प्रकृति के प्रति प्रेम, काव्यानुभूति की संस्कृति, कथ्य के प्रति तन्मयता और सच्चाई, अपने समय और समाज के प्रति दायित्वों का बोध, तात्कालिक कथ्यों पर लिखी जानेवाली कविताओं में स्थायी अभिप्रायों की खोज, रोज़मर्रा जीवन की सामान्य घटनाओं पर सृजन, कविता का सहज रूप और आत्मीय रचाव, घटनाओं के संयोजन में तटस्थता, अनुभव और भाषा की एकान्विति, अपने समय के संशय और अँधेरे की खोज, स्मृति की रचनात्मक सम्भावना की खोज, कविता में ईमानदार पारदर्शिता, नैतिक विवेक का दायित्व, अपने समय की यातना के प्रति बेचैनी, विस्मयकारी यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए विरूपता के बोध में सक्षम कला चेतना, ब्योरों में से नये अर्थ और संकेतों की खोज जैसे निकष समकालीन हिन्दी कविता ही नहीं, भारतीय कविता को भी उसकी सम्पूर्णता में परखने में समर्थ हैं।

About the writer

MANAGER PANDEY

MANAGER PANDEY सुप्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का जन्म 23 सितम्बर, 1941 को बिहार प्रान्त के वर्तमान गोपालगंज जनपद के गाँव ‘लोहटी’ में हुआ। उनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव में तथा उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ से उन्होंने एम.ए. और पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। पाण्डेय जी गत साढे़ तीन दशकों से हिन्दी आचोलना में सक्रिय हैं। उन्हें गम्भीर और विचारोत्तेजक आलोचनात्मक लेखन के लिए पूरे देश में जाना-पहचाना जाता है। उनकी अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं: शब्द और कर्म, साहित्य और इतिहास-दृष्टि, साहित्य के समाजशास्त्रा की भूमिका, भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य, अनभै साँचा, आलोचना की सामाजिकता, संकट के बावजूद (अनुवाद, चयन और सम्पादन), देश की बात (सखाराम गणेश देउस्कर की प्रसिद्ध बांग्ला पुस्तक ‘देशेर कथा’ के हिन्दी अनुवाद की लम्बी भूमिका के साथ प्रस्तुति), मुक्ति की पुकार (सम्पादन), सीवान की कविता (सम्पादन)। पाण्डेय जी के साक्षात्कारों के भी दो संग्रह प्रकाशित हैं: मेरे साक्षात्कार, मैं भी मुँह में जबान रखता हूँ। आलोचनात्मक लेखन के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित, जिनमें प्रमुख हैं: हिन्दी अकादमी द्वारा दिल्ली का साहित्यकार सम्मान, राष्ट्रीय दिनकर सम्मान, रामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थान, वाराणसी का गोकुल चन्द्र शुक्ल पुरस्कार और दक्षिण भारत प्रचार सभा का सुब्रह्मण्य भारती सम्मान। मैनेजर पाण्डेय ने हिन्दी में एक ओर ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि’ के माध्यम से साहित्य के बोध, विश्लेषण तथा मूल्यांकन की ऐतिहासिक दृष्टि का विकास किया है तो दूसरी ओर ‘साहित्य के समाजशास्त्रा’ के रूप में हिन्दी में साहित्य की समाजशास्त्राीय दृष्टि के विकास की राह बनाई है। अपने आलोचना-कर्म में वे परम्परा के विश्लेषणपरक पुनर्मूल्यांकन के भी पक्षधर रहे हैं। उन्होंने भक्त कवि सूरदास के साहित्य की समकालीन सन्दर्भों में व्याख्या कर भक्तियुगीन काव्य की प्रचलित धारणा से अलग एक सर्वथा नयी तर्काश्रित प्रासंगिकता सिद्ध की है। पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी में दलित साहित्य और स्त्राी-स्वतन्त्राता के समकालीन प्रश्नों पर जो बहसें हुई हैं, उनमें पाण्डेय जी की अग्रणी भूमिका को बार-बार रेखांकित किया गया है। उन्होंने सत्ता और संस्कृति के रिश्ते से जुड़े प्रश्नों पर भी लगातार विचार किया है। कहा जा सकता है कि उनकी उपस्थिति प्रतिबद्धता और सहृदयता के विलक्षण संयोग की उपस्थिति है। जीविका के लिए अध्यापन का मार्ग चुनने वाले मैनेजर पाण्डेय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा संस्थान के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफेसर रहे हैं। इसके पूर्व बरेली कॉलेज, बरेली और जोधपुर विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे।

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