KAANTE KE BAAT-10 : PRET MUKTI

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-725-9

Author:ED. RAJENDRA YADAV

Pages:134


MRP : Rs. 100/-

Stock:In Stock

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प्रेत-मुक्ति

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जितना सोचता हूँ उतना ही कन्विस होता जाता हूँ कि इतिहास की बेड़ियाँ हमारे आगे बढ़ने में सबसे बड़ी बाधा हैं। झूठ है कि इतिहास हमें आगे की रोशनी दिखाता है। मुझे तो अपने यहाँ एक भी प्रमाण नहीं मिलता जब किसी व्यक्ति या जाति ने इतिहास से कुछ सीखा हो। हम उन्हीं गलतियों को बार-बार दुहराते हैं और अपने समाधान अपनी परिस्थितियों के दबाव में ही तलाश करते हैं। विज्ञान के निरंतर विकास का कारण शायद यही है कि वहाँ हर पुराना अस्वीकृत होता रहता है, इतिहास में हर पुराना विरासत बनकर भविष्य की छाती से चिपका रहता है। विज्ञान का इतिहास आगे के लिए सबक होता है ताकि आनेवाले वैज्ञानिक पीछे जो हो चुका है उससे आगे काम कर सकें। उसकी गति एकरेखकीय है। इतिहास लगभग चक्राकार घूमता है। बार-बार उन्हीं स्थितियों को दुहराता है। दुम पकड़ने के लिए घूमते कुत्ते की तरह। आज अगर हमें भविष्य की यात्रा करनी है तो उतने ही सामान के साथ करनी होगी जो नितांत ज़रूरी है और कम से कम है। इतिहास, संस्कृति भी उतने ही हमारे साथ जाएँगे जितने अनिवार्य हैं। दूसरे शब्दों में हमारी ज़रूरत का इतिहास, स्मृति, संस्कार और दृष्टि बनकर ख़ुद-ब-ख़ुद हमारे साथ होगा। उसके लिए अलग से पोथे लादने की ज़रूरत नहीं होगी। फिर कोई एक सर्वमान्य इतिहास हमारे पास है कहाँ ? हर सत्ता अपने इतिहास अपने ढंग से लिखाती है. अपने को जायज सिद्ध करने के लिए घटित में तोड़-मरोड़ करती है और हर असुविधाजनक या अस्वीकार्य को दबाने, समाप्त करने की कोशिश करती है। हम कभी इतिहास नहीं लिखते, सिर्फ़ वर्तमान लिखते हैं। उसी के लिए इतिहास को तोड़ते-मरोड़ते, छाँटते या छोड़ते हैं। तटस्थ और संपूर्ण इतिहास जैसी कोई चीज़ नहीं होती, सिर्फ़ उसका उपयोग होता है। विद्वान और अध्येता दुनियाभर के शोधों, प्रमाणों, स्रोतों-साधनों को आधार बनाकर चाहे जितने प्रामाणिक दस्तावेज़ तैयार करें, हम वही पढ़ेंगे जो हमारी अपनी या हमारे आज की ज़रूरत है।

About the writer

ED. RAJENDRA YADAV

ED. RAJENDRA YADAV राजेन्द्र यादव जन्म : 28 अगस्त, 1929 शिक्षा : एम.ए. (आगरा)। प्रथम रचना : प्रतिहिंसा ('चांद' के भूतपूर्व सम्पादक श्री रामरखसिंह सहगल के मासिक 'कर्मयोगी' में) 1947 में। प्रकाशित रचनाएँ : सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, शह और मात, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), कुलटा, अनदेखे अनजाने पुल, मंत्रविद्ध (उपन्यास) देवताओं की मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, ढोल और अपने पार, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रिय कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ, प्रेम कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ और चौखटे तोड़ते त्रिकोण। (अब तक की तमाम कहानियाँ पड़ाव-1, पड़ाव-2 और 'यहाँ तक' शीर्षक तीन जिल्दों में संकलित) (कहानी संग्रह), आवाज़ तेरी है (कविता संग्रह) कहानी : स्वरूप और संवेदना, उपन्यास : स्वरूप और संवेदना, कहानी : अनुभव और अभिव्यक्ति, औरों के बहाने, अठारह उपन्यास, कांटे की बात शृंखला (निबन्ध संग्रह)। 'सम्पादन : नये साहित्यकार पुस्तकमाला में मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, फणीश्वरनाथ रेणु तथा मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाँ। एक दुनिया : समानान्तर, कथा-यात्रा, कथा-दशक, आत्मतर्पण और काली सुखियाँ (अफ्रीकी कहानियाँ)। 'अनुवाद : हमारे युग का एक नायक : लर्मेल्तोव, प्रथम प्रेम, 'वसंत प्लावन : तुर्गनेव, टक्कर : ऐन्तोन चेखव, संत 'सर्गीयस : टालस्टॉय, एक महुआ : एक मोती : स्टाइन बैक, 'अजनबी : अलबेयर कामू (छहों उपन्यास कथा-शिखर-1,2 शीर्षक से दो जिल्दों में संकलित)। निधन : 28 अक्टूबर 2013

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