KAANTE KE BAAT-7 : ANDHERON SE UTHATI GUHAAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-340-4

Author:ED. RAJENDRA YADAV

Pages:122


MRP : Rs. 200/-

Stock:In Stock

Rs. 200/-

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अँधेरों से उठती गुहार

Additional Information

बीसवीं सदी हमारे देखते-देखते मुट्ठी में से रेत की तरह फिसल रही है। वही अनसुलझी पहेलियाँ फेंककर चिंता और खेद के विषय छोड़कर। मध्यवर्ग की मरण-कामना ऐसा ही एक मुद्दा है, जो कांटे की बात के इस सातवें खंड का मुख्य विमर्श बिंदु है। स्वतंत्रता के पहले दशक में जो मध्यवर्ग युवा आकांक्षाओं और अनंत संभावनाओं से खलबला रहा था और अपनी उद्दाम ऊर्जा की लक्ष्मी को दृष्टि विहीन भ्रष्ट नेताओं की रूढ़िबद्ध राजनीति में कैद पाकर अँधेरों से गुहार उठा रहा था, वही आज मुझे मेरे खोल में रहने दो का नारा बुलंद कर रहा है। आज वह पितृ -पीढ़ी में तब्दील हो चुका है। उसकी ट्रैजडी यह है कि उसने भ्रष्ट व्यवस्था के साथ सुविधा-समझौतों के बड़े अच्छे समीकरण बिठा लिये हैं। पर अपनी ही बनाई मूर्ति को ध्वस्त कर उपभोक्तावादी युवा पॉप पीढ़ी को जन्म दिया है-अपनी अवैध संतान के रूप में - उसी पीढ़ी ने उसे आज निरर्थक और अप्रासंगिक बना दिया है। अचरज की बात तो यह है कि इतनी तूफानी उथल पुथल से गुजरने के बावजूद यह पीढ़ी अब भी पूरी तरफ आत्मलिप्त होकर अपने साहित्य में अपनी ही प्रासंगिकता तलाश रही है। वह भी बाहर के संघर्षों से जुड़कर नहीं बल्कि अध्यात्म और व्यक्तिगत मोक्ष के खोखले प्रयासों में। हिंदी प्रदेशों का वैचारिक संकट यही है कि उसमें बंद दृष्टि से अपना सीमित, संकुचित, व्यक्तिगत सत्य ही लिखा गया है। ईश्वर, स्त्री और समाज-इन तीनों के प्रति उसका नजरिया अपरिवर्तनवादी, परंपराबद्ध, प्रश्नहीन समर्थक का रहा है। अभिनिवेशी और उपनिवेशी महानताएँ, पतन की स्वतंत्रता के पचास साल जैसे कई लेख मुख्यधारा के हिंदी साहित्य की इसी जड़ता के सौ वर्षों का इतिहास बताते हैं। समय गुजरने के साथ जो जाने-पहचाने, आत्मीय-अजनबी साथ छोड़ गए हैं, उनके प्रति श्रद्धांजलियाँ हैं स्मृति दंश में।

About the writer

ED. RAJENDRA YADAV

ED. RAJENDRA YADAV राजेन्द्र यादव जन्म : 28 अगस्त, 1929 शिक्षा : एम.ए. (आगरा)। प्रथम रचना : प्रतिहिंसा ('चांद' के भूतपूर्व सम्पादक श्री रामरखसिंह सहगल के मासिक 'कर्मयोगी' में) 1947 में। प्रकाशित रचनाएँ : सारा आकाश, उखड़े हुए लोग, शह और मात, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), कुलटा, अनदेखे अनजाने पुल, मंत्रविद्ध (उपन्यास) देवताओं की मूर्तियाँ, खेल-खिलौने, जहाँ लक्ष्मी कैद है, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक, टूटना, ढोल और अपने पार, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, श्रेष्ठ कहानियाँ, प्रिय कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ, प्रेम कहानियाँ, दस प्रतिनिधि कहानियाँ और चौखटे तोड़ते त्रिकोण। (अब तक की तमाम कहानियाँ पड़ाव-1, पड़ाव-2 और 'यहाँ तक' शीर्षक तीन जिल्दों में संकलित) (कहानी संग्रह), आवाज़ तेरी है (कविता संग्रह) कहानी : स्वरूप और संवेदना, उपन्यास : स्वरूप और संवेदना, कहानी : अनुभव और अभिव्यक्ति, औरों के बहाने, अठारह उपन्यास, कांटे की बात शृंखला (निबन्ध संग्रह)। 'सम्पादन : नये साहित्यकार पुस्तकमाला में मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, फणीश्वरनाथ रेणु तथा मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाँ। एक दुनिया : समानान्तर, कथा-यात्रा, कथा-दशक, आत्मतर्पण और काली सुखियाँ (अफ्रीकी कहानियाँ)। 'अनुवाद : हमारे युग का एक नायक : लर्मेल्तोव, प्रथम प्रेम, 'वसंत प्लावन : तुर्गनेव, टक्कर : ऐन्तोन चेखव, संत 'सर्गीयस : टालस्टॉय, एक महुआ : एक मोती : स्टाइन बैक, 'अजनबी : अलबेयर कामू (छहों उपन्यास कथा-शिखर-1,2 शीर्षक से दो जिल्दों में संकलित)। निधन : 28 अक्टूबर 2013

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