Chaturang

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-7055-784-5

Author:SHAILENDRA SAGAR

Pages:420


MRP : Rs. 395/-

Stock:In Stock

Rs. 395/-

Details

चतुरंग

Additional Information

'चतुरंग' में प्रत्यक्ष और अदृश्य रूप में सम्पूर्ण जीवन को आक्रान्त करती उस राजनीति का घनीभूत चित्रण है जो विकास योजनाओं की नियति निर्धारित करती है। समाजशास्त्र में नये समीकरण बनाते सवर्ण-दलित द्वन्द्व परम्परा बनाम आधुनिकता के संघर्ष और दलित नेतृत्व पर काबिज़ होने की होड़ को बिना किसी सैद्धान्तिक पूर्वाग्रह के यहां पढ़ा जा सकता है। शैलेन्द्र सागर का यह प्रथम उपन्यास 'चतुरंग' अनेक संदर्भो में दलित आख्यान के कुछ नवीन प्रस्थान निर्मित करता है। इसमें समकालीन ग्रामीण संरचना में सांस लेती दरभिसंधियों को उद्घाटित किया गया है। प्रतिरोध का पक्ष रचते वे स्वप्न भी हैं जो विवेक, समता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित मानवीय समाज को मूर्त करना चाहते हैं। कहना न होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गाँव ठाकुरपुरवा के यथार्थ का अन्वेषण करते हुए लेखन ने 'स्वातंत्र्योत्तर ग्राम-संग्राम' की अनुगूंजों को आत्मसात किया है। ...इस तरह कि यह सब पाठक के अनुभव का हिस्सा बन जाय। उपन्यास की आंतरिक आंच को तीव्र करती हैं मनोज-नयनी और रमेश-आशा की प्रेम कहानियाँ। जीवन की सहज रागात्मक स्वीकृतियों की अमानवीय अस्वीकृतियों तथा उनकी बर्बर परिणति हेतु उत्तरदायी शक्तियों को उपन्यासकार ने तटस्थ प्रामाणिकता के साथ चिन्हित किया है। इन प्रसंगों में विडंबनाएँ अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यंजित हुई हैं। गुलजार और संतोषी की अंतर्कथा दलित समाज में सिर उठाती विसंगतियों को वास्तविकता के आलोक में परखती है। ‘पंच परमेश्वर' की आवधारणा में पड़ रही दरारों से झाँकते लोकतंत्र की जमीनी शिनाख्त उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाती है। यह प्रश्न बार-बार बेचैन करता है कि हर घटना को अपने हित में खपाने की मनोवृत्ति समाज को कहां ले जायेगी। सर्वोपरि विशेषता यह है कि 'चतुरंग' का भाषिक विन्यास सहजता की सार्थक शक्ति से ओतप्रेत है। आंचलिक उपादानों का सार्वदेशिक रूपान्तरण करते हुए शैलेन्द्र सागर ने 'वृत्तांत में विमर्श' की ऊर्जा भर दी है, यह उल्लेखनीय है।

About the writer

SHAILENDRA SAGAR

SHAILENDRA SAGAR जन्म : 5 अप्रैल 1951 को रामपुर उ.प्र. में। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के बाद तीन वर्ष का अध्यापन, 1974 में उ.प्र. राज्य सिविल सर्विस में चयन और वर्ष 1976 से आईपीएस में सेवा। 2010 में पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग सौ कहानियां, लघुकथाएँ प्रकाशित। अब तक तीन उपन्यास (चतुरंग, चलो दोस्त सब ठीक है व एक सुबह यह भी) और पाँच कहानी संग्रह प्रकाशित। स्त्री विमर्श पर दो पुस्तकों का सम्पादन। कहानी संग्रह ‘माटी' पर विजय वर्मा सम्मान व उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत, उपन्यास 'चलो दोस्त सब ठीक है' पर उ.प्र. हिन्दी संस्थान का प्रेमचन्द सम्मान एवं कथाक्रम पत्रिका पर सरस्वती सम्मान। 1998 से प्रमुख साहित्यिक त्रैमासिकी ‘कथाक्रम' का नियमित सम्पादन।

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