KANYADAN

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-7055-282-6

Author:Hari Mohan Jha Translated by Vibha Rani

Pages:104


MRP : Rs. 125/-

Stock:In Stock

Rs. 125/-

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कन्यादान

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साहित्य अकादमी पुरस्कार द्वारा सम्मानित प्रख्यात मैथिली कथाकार हरिमोहन झा का बहुचर्चित उपन्यास है 'कन्यादान' जो सिर्फ़ एक किताब' नहीं, मिथिलांचल में करिश्मा सिद्ध हुआ है। सुखद आश्चर्य यह है कि इस उपन्यास को पढ़ने के लिए गैर-मैथिली-भाषियों ने मैथिली सीखी, जिसके पाठक साक्षर ही नहीं निरक्षर भी थे, जिन्होंने दूसरों से पढ़वाकर इसे सुना। इस उपन्यास ने लोकप्रियता का नया कीर्तिमान तो स्थापित किया ही, साहित्यिक उपलब्धियों के शिखर पर भी पहुँचा। कथाकार स्व. हरि मोहन झा का कथा-संसार बहुत व्यापक और क्रान्तिकारी है, जिसमें जीवन की इन्द्रधनुषी भंगिमाओं को अर्थवान पहचान मिली है। और इसका सबूत है उनका यह व्यंग्य प्रधान रोचक उपन्यास 'कन्यादान'। अपनी भाषायी रचावट और शिल्प की बुनावट में तो 'कन्यादान' अप्रतिम है ही, मैथिली समाज की मनोवृत्तियों और विसंगतियों को बेबाक एवं मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति देने में भी यह उपन्यास अद्वितीय है।

About the writer

Hari Mohan Jha Translated by Vibha Rani

Hari Mohan Jha Translated by Vibha Rani "जन्म: सन् 1908। जन्म स्थान: कुँवर बाजितपुर, जिला वैशाली (बिहार)। सन् 1932 में पटना विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए.। इसके बाद पटना विश्वविद्यालय में ही दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और फिर विभागाध्यक्ष रहे। अपने बहुमुखी रचनात्मक अवदान से मैथिली साहित्य की श्री-वृद्धि करनेवाले विशिष्ट लेखक। भारतीय दर्शन और संस्कृति-काव्य साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान के रूप में विशेष ख्याति अर्जित की। धर्म, दर्शन और इतिहास, पुराण के अस्वस्थ, लोकविरोधी प्रसंगों की दिलचस्प लेकिन कड़ी आलोचना। इस सन्दर्भ में ‘खट्टर काका’ जैसी बहुचर्चित व्यंग्यकृति विशेष उल्लेखनीय। मूल मैथिली में करीब 20 पुस्तकें प्रकाशित। कुछ कहानियों का हिंदी, गुजराती और तमिल में अनुवाद। प्रमुख कृतियाँ: कन्यादान, द्विरागमन (उपन्यास); प्रणम्य देवता, रंगशाला (हास्य कथाएँ); खट्टर काका (व्यंग्य-कृति); चरचरी (विधा-विविधा)।" / अनुवादक परिचय विभा रानी जन्म : 1959 शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), बी.एड. साहित्य : बंद कमरे का कोरस (हिन्दी कहानी संग्रह), 'मिथिला की लोककथाएँ', 'कन्यादान' (मैथिली उपन्यास : हरिमोहन झा), 'राजा पोखरे में कितनी मछलियाँ' (मैथिली उपन्यास : प्रभास कुमार चौधरी) के हिन्दी अनुवाद, 'खोह स निकसइत' (मैथिली कथा संग्रह) प्रकाशित, पटाक्षेप (मैथिली उपन्यास : लिली रे), गोनू झा के किस्से प्रकाश्य, विभिन्न विज्ञापन एजेंसियों व फिल्म्स डिविज़न के लिए स्क्रिप्ट लेखन, इधर नाटक लेखन भी, 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' नाटक 'द एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन' मुंबई द्वारा मंचित और अत्यंत चर्चित, कोसी के आर-पार, आज की कविता मुंबई-1, बस, अब और नहीं, में कहानियाँ, कविताएं, संकलित। सम्मानः कथा अवार्ड 1998, मैथिली कहानी 'रहथु साक्षी छठ घाट' के लिए; डॉ. माहेश्वरी सिंह ‘महेश' ग्रंथपुरस्कार मैथिली कथा संग्रह 'खोह स निकसइत' के लिए: घनश्याम दास सर्राफ साहित्य-सम्मान हिन्दी कहानी संग्रह 'बंद कमरे का कोरस' के लिए।

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