SWAPNMAYI

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-732-1

Author:VISHNU PRABHAKAR

Pages:


MRP : Rs. 125/-

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Rs. 125/-

Details

स्वप्नमयी

Additional Information

'स्वप्नमयी' एक माँ की कहानी है-एक ऐसी माँ की जो स्वप्न तो देखती है, परन्तु उसे जी नहीं पाती। इसीलिए नहीं कि उसमें साहस की कमी है, बल्कि इसलिए कि वह बहुत भोली है और साथ ही प्रयोगों में विश्वास करती है। ऐसे चरित्र कितने ही ऊँचे हों, कितने ही महान हों, लेकिन इस संसार में उनके लिए जगह नहीं है। स्वप्न को चरितार्थ करने के लिए व्यक्ति को अपने ऊपर भी अंकुश लगाना होगा। इस तरह के चरित्र की झलक 'स्वप्नमयी' की देवरानी में मिल सकती है । 'स्वप्नमयी' का पति भी इस बात को समझ लेता है, परन्तु तब जब स्वयं देखने वाली ही नहीं रहती। काश कि वह कुछ पहले समझ पाता। यह मेरे अधिकार में था कि मैं उसे समझा सकता, लेकिन तब तो इस उपन्यास के लिखने की कोई जरूरत ही नहीं थी। बस आगे का भार पाठक पर ही रहे तो अच्छा है। -विष्णु प्रभाकर

About the writer

VISHNU PRABHAKAR

VISHNU PRABHAKAR अपने साहित्य में भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने के लिये प्रसिद्ध रहे श्री विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून सन् 1912 को मीरापुर, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा पंजाब में हुई। उन्होंने सन् 1929 में चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, हिसार से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तत्पश्चात् नौकरी करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से भूषण, प्राज्ञ, विशारद, प्रभाकर आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही बी.ए. भी किया। विष्णु प्रभाकर जी ने कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रा-वृत्तांत और कविता आदि प्रमुख विधाओं में लगभग सौ कृतियाँ हिंदी को दीं। उनकी ‘आवारा मसीहा’ सर्वाधिक चर्चित जीवनी है, जिस पर उन्हें ‘पाब्लो नेरूदा सम्मान’, ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ सदृश अनेक देशी-विदेशी पुरस्कार मिले। प्रसिद्ध नाटक ‘सत्ता के आर-पार’ पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ मिला तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वार ‘शलाका सम्मान’ भी। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘गांधी पुरस्कार’ तथा राजभाषा विभाग, बिहार के ‘डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया। विष्णु प्रव्हाकर जी आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में पर्याप्त लोकप्रिय रहे। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करने वाले विष्णु जी जीवन पर्यंत पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकार के रूप में साहित्य-साधनारत रहे। 11 अप्रैल सन् 2009 को दिल्ली में विष्णु जी इस संसार से विदा ले गये।

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