Paangira

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-7055-294-9

Author:VISHWAS PATIL

Pages:238


MRP : Rs. 150/-

Stock:In Stock

Rs. 150/-

Details

पांगिरा

Additional Information

' पांगिरा ' में रोशनी और अँधेर की वही धड़कनें हैं, उसकी मिट्टी और मौसम के वही रंग और मिजाज हैं, वही राग और विराग हैं, आपाधापी और जद्दोजहद हैं, धूल फूल पत्तों की सरसराहट भी वैसी ही है-जो आज के किसी भी भारतीय गाँव में सहज उजागर 'पांगिरा'-महाराष्ट्र का एक आधुनिक भारतीय गाँव-इस उपन्यास का केन्द्रीय कथानायक है। दरअसल, पांगिरा एक ऐसा विराट कैनवास है जिस पर तमाम चलती हुई गतियों में फँसे लोगों की बहरूपी तसवीरें हैं, जो अपन-अपने तरीके से इस उपन्यास का ख़ुश और उदास अर्थ देत हैं-पूरी आत्मीयता और सजगता के साथ। -और शायद इसीलिए 'पांगिरा' उपन्यास को एक सशक्त सामाजिक दस्तावेज़ कहना गलत नहीं होगा। क्योंकि मराठी भाषा के प्रख्यात उपन्यासकार श्री विश्वास पाटिल ने इस प्रतीकात्मक सामाजिक दस्तावेज के जरिए जीवन की सार्थक परिभाषा को तलाश करना चाहा है। मूल मराठी से अनूदित इस बहुचर्चित उपन्यास की अपनी अनुवादगत सीमाएँ हैं, लेकिन गाँव का यह महाकाव्य हिन्दी के उपन्यास-प्रमी पाठकों को रोचक, रोमांचक और सखद अनुभव देगा।।

About the writer

VISHWAS PATIL

VISHWAS PATIL पानीपत ऐतिहासिक उपन्यास के 1989 में मराठी में बहुचर्चित होने के साथ ही मराठी साहित्य के क्षितिज पर विश्वास पाटील का नाम पूरी तेजी से जगमगाने लगा। इस ऐतिहासिक उपन्यास ने पाठकों की लोकप्रियता की बुलन्दियों को देखते-ही-देखते छू लिया। अब तक मराठी में इस उपन्यास के दस संस्करण निकल चुके हैं और पच्चीस हजार प्रतियाँ हाथोंहाथ बेची गयी हैं। भाषा परिषद् पुरस्कार (कलकत्ता), प्रियदर्शिनी अकादमी पुरस्कार (मुम्बई), नाथ माधव पुरस्कार (गोवा) आदि इकत्तीस सम्मान इस उपन्यास को प्राप्त हो चुके हैं। इस दृष्टि से पानीपत किसी भी भाषा साहित्य में मील का पत्थर बन गया है। तत्पश्चात पांगिरा, झाडाझडती आदि उपन्यास लिखकर विश्वास पाटील ने पाठकों को झकझोरा। क्योंकि ऐतिहासिक रंजकता के वायवी धरातल से शुरू कर घोर यथार्थ एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म मानवीय सम्बन्धों के धरातल के रू-ब-रू ला खड़ा करने में वे पूर्णतया सफल हो गये हैं। तेजी से बदलते जा रहे ग्राम जीवन का सार्थक आलेख पांगिरा में है तो झाडाझडती औद्योगिक विकास क्रम में सहायक विशाल बाँध परियोजनाओं का शिकार बने मायूस किन्तु जीवट विस्थापितों की व्यथा-कथा का मुखर स्वर है। श्री पाटील झाडाझडती को 1992 में साहित्य 'अकादेमी पुरस्कार जैसा अतिविशिष्ट सम्मान तो प्राप्त हुआ ही, इसके अलावा अन्य बाईस पुरस्कार-सम्मान भी मिले। पाँच संस्करणों में इस उपन्यास की ग्यारह हजार प्रतियाँ इस बीच सुधी पाठकों तक पहुँच चुकी हैं। श्री पाटील लम्बे समय से सरकारी सेवा में रहे हैं। इन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन एवं द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में नेताजी सुभाषचन्द्र के जीवन पर आधारित एक वृहत् 'उपन्यास महानायक की रचना की है। उनके सभी उपन्यास हिन्दी में उपलब्ध हैं।

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