SAMRANGARH

Format:Hard Bound

ISBN:81-7055-938-3

Author:MEHARUNNISA PARVAZE

Pages:356


MRP : Rs. 350/-

Stock:In Stock

Rs. 350/-

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समरांगण

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समरांगण नर्मदा की धारा में जब डुबकी लगाकर रायबहादुर पंडित गोपीलाल उठे तो उन्हें लगा नर्मदा में रायबहादर पंडित गोपीलाल डूब गए हैं और नर्मदा की धारा से वही पुराना पंडित गोपीलाल बाहर आ गया है जिसके पास खाने और खर्च के लिए एक कोड़ी भी नहीं थी। नर्मदा के तट पर भिक्षा माँगते एक भिखारी से वह खड़े थे। भिक्षादेहि! माँ भिक्षादेहि!! बरसों पहले तब इसी नर्मदा की धारा में डुबकी लगाए थे, तब ही उन्हें सपनों की नगरी मिली थी। दोबारा कभी नर्मदा की धारा में डुबकी लगाने का ध्यान उन्हें क्यों नहीं आया? जिस परिकथा की कल्पना में वह सारे जीवन डुबे रहे आज वह किला कैसा ध्वस्त सा दिख रहा था। जीवन की इतनी लंबी यात्रा कैसे व्यर्थ चली गई थी। दूर-दूर तक नर्मदा का पानी ही पानी दिख रहा था। नर्मदा का सौंदर्य चारों ओर बिखरा था। एक स्वप्न लोक की तरह सारी संगमरमर की विशाल चट्टानें लग रही थीं। जिस नर्मदा में डुबकी लगाकर उन्होंने सब कुछ पाया था, आज उसी नर्मदा में डुबकी लगाकर वह सब खो चुके थे। उनके मन का रोदन किसी को सुनाई नहीं दे रहा था, परंतु नर्मदा चुप सुन रही थी और अपने ठंडे जल से उन्हें स्नान करा रही थी। नर्मदा उन्हें शांत कर रही थी। उन्हें नन्हे शिशु की तरह दुलार रही थी। कहते हैं भगवान शंकर भी समद्र मंधन में निकले विष को पीकर नर्मदा के तट पर ही शांत होने आए थे। आज गोपीलाल भी जीवन मंथन से निकले विष को पीकर नर्मदा के तट पर शांत होने आए थे। नर्मदा के तट पर अपने जीवन की सबसे कीमती पँजी को बहाने आए थे। अपने जीवन का समस्त सुख-सौभाग्य, संपन्नता वैभव की आहूति देने आए थे। सारे सुखों की गठरी को तर्पण करने आए थे। जीवन का सूरज इब गया था और कालरात्रि प्रारंभ हो चुकी थी।

About the writer

MEHARUNNISA PARVAZE

MEHARUNNISA PARVAZE आम नारी-जीवन की त्रासदियों को सहज ही कहानी का रूप देने में कुशल मेहरुन्निसा परवेज का जन्म मध्य प्रदेश के बालाघाट के बहेला ग्राम में 10 दिसंबर, 1944 को हुआ । इनकी पहली कहानी 1963 में साप्‍ताहिक ' धर्मयुग ' में प्रकाशित हुई । तब से निरंतर उपन्यास एवं कहानियाँ लिख रही हैं । इनकी रचनाओं में आदिवासी जीवन की समस्याएँ सामान्य जीवन के अभाव और नारी-जीवन की दयनीयता की मुखर उाभिव्यक्ति हुई है । इनको ' साहित्य भूषण सम्मान ' (1995), ' महाराजा वीरसिंह जू देव पुरस्कार ' (1980), ' सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार ' (1995) आदि सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है । कई रचनाओं के अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं । इनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं- आँखों की दहलीज, कोरजा, अकेला पलाश (उपन्यास); आदम और हब्बा, टहनियों पर धूप, गलत पुरुष,‌फाल्‍गुनी , अंतिम पढ़ाई, सोने का बेसर, अयोध्या से वापसी, एक और सैलाब, कोई नहीं, कानी बोट, ढहता कुतुबमीनार, रिश्ते, अम्मा, समर (सभी कहानी संग्रह) ।

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