AGYEYA : VAGARTH KA VEBHAV

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-202-2

Author:ED. RAMESH CHANDRA SHAH

Pages:136


MRP : Rs. 325/-

Stock:In Stock

Rs. 325/-

Details

अज्ञेय: वामर्थ का वैभव

Additional Information

अज्ञेय हिन्दी कविता में आधुनिक भाव-बोध के अग्रदूत माने जाते रहे हैं और उनके कवि-कर्म तथा चिन्तन दोनों में एक गहरा दायित्व-बोध, स्वातन्त्र्य-चेतना और उससे अनिवार्यतः जुड़ी हुई सांस्कृतिक अस्मिता की शोध का अध्यवसाय भी उत्तरोत्तर विकसित होता गया है। दोनों ही भूमिकाओं में अज्ञेय की चिन्ता का केन्द्र हिन्दी का साधारण पाठक ही रहा और उसमें भी जोर उस पाठक की अपनी स्वाधीन आत्म-चेतना को जगाने पर, जो कि भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के साथ एक रचनात्मक, गतिशील सम्बन्ध स्थापित करती है। साक्षात जिये जा रहे जीवन और आधुनिक विचार-प्रवाहों के बीचोबीच मज़बूती से पाँव टिकाकर अपने देश और समाज की नियति को पहचानना तथा उसके निर्माण में सचेत योगदान करना ही उसकी मूल प्रेरणा है। हीरानन्द शास्त्री स्मारक व्याख्यान माला के निमित्त से प्रस्तुत इस ग्रन्थ में हिन्दी के जाने-माने कवि-कथाकार-आलोचक और अज्ञेय-साहित्य के मर्मज्ञ रमेश चन्द्र शाह ने अज्ञेय के कवि-कर्म और वैचारिक कृतित्व को न केवल स्वायत्त उपलब्धियों की तरह, बल्कि एक विलक्षण अन्तःसंगति में जुड़ी परस्परपूरक प्रक्रियाओं की तरह भी देखा और दिखलाया है। यदि महान आयरिश कवि यीट्स को 'भारतीय संस्कृति की बुझती हुई जोत' के दर्द के साथ-साथ इस बात का भी गुस्सा था कि... “सत्य की सर्वप्रथम खोज करने वाला भारत क्यों आज अपनी ही खोज की पहचान तक के लिए यूरोप का मुँह ताकने को लाचार है" तो उनके समानधर्मा अज्ञेय को भी अपने देशवासियों की दुरवस्था ने यह सन्तोष व्यक्त करने को विवश किया था कि. ... “भारतीय संस्कृति ने अपनी सर्जनशीलता मानो खो दी है; अपने जीने का कारण ढूँढ़ने के लिए वह मानो पराया मुँह जोह रही है।" एक ओर यदि टी.एस. एलियट का 'दि वेस्टलैंड' है और उसमें झलकती सिकुड़ी-सिमटी 'गंगा', तो दूसरी ओर अज्ञेय की 'मरुथल-शृंखला' है, जिसमें... "देवता अब भी जलहरी को घेरे बैठे हैं; पर जलहरी में पानी सूख गया है।" इस यथार्थ के बेहिचक स्वीकार और आकलन के बावजूद इस अत्यन्त रोचक और विचारोत्तेजक ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए लेखक का निष्कर्ष यह है कि जो कवि इस तरह अपनी कविता में देवताओं के सूखते जाने को, 'नन्दा' के नीचे बिछ रहे मरुस्थल को पहचान सकता है, उसका कवि-कर्म और उस कवि-कर्म के पीछे कार्यरत अन्तःप्रक्रियाओं का भरा-भूरा गद्य-साक्ष्य भी हमें आश्वस्त करता है कि वह न केवल इस त्रास के यथातथ्य साक्षात्कार में समर्थ है, प्रत्युत इस 'त्रासजनित विवेक' को भी 'पावनताजनित बोध' में रूपान्तरित कर सकने वाले सांस्कृतिक ऊर्जा-स्रोतों तक भी उसकी पहुँच निस्सन्देह है। वैसी ही पहुँच हिन्दी के समकालीन लेखकों और पाठकों की भी अद्यावधि-अक्षुण्ण बनी रहे, यही इस पुस्तक के प्रस्तुतीकरण का प्रयोजन है और औचित्य भी।

About the writer

ED. RAMESH CHANDRA SHAH

ED. RAMESH CHANDRA SHAH रमेशचन्द्र शाह का जन्म (1937) अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में हुआ। आरम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एससी. तथा आगरा से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1997 में भोपाल के हमीदिया महाविद्यालय से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भोपाल स्थित ‘निराला सृजनपीठ’ के निदेशक रहे (दिसम्बर, सन् 2000 तक)। उपन्यास ‘पूर्वापर’ को भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता ने, ‘गोबरगणेश’ तथा काव्यकृति ‘नदी भागती आई’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने, आलोचना-पुस्तक ‘छायावाद की प्रासंगिकता’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने पुरस्कृत किया। उपन्यास ‘किस्सा गुलाम’ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। निबन्ध-संग्रह ‘स्वधर्म और कालगति’ को मध्यप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार प्रदान किया गया। श्री शाह को सन् 1987-88 में मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा ‘शिखर-सम्मान’ से सन् 2001 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा ‘व्यास-सम्मान’ से तथा सन् 2004 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया जा चुका है। प्रकाशित कृतित्व: ‘रचना के बदले’, ‘शैतान के बहाने’, ‘आडई़ का पेड़’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ (निबन्ध-संग्रह); ‘कछुए की पीठ पर’, ‘हरिश्चन्द्र आओ’, ‘नदी भागती आई’, ‘प्यारे मुचकुन्द को’, ‘देखते हैं शब्द भी अपना समय’, चुनी हुई कविताओं का संकलन ‘चाक पर’ वाग्देवी प्रकाशन पॉकेट बुक संस्करण में उपलभ्य, तीन बाल कविता-संग्रह तथा दो बाल-नाटक भी (कविता-संग्रह); ‘गोबरगणेश’, ‘किस्सा गुलाम’, ‘पूर्वापर’, ‘आखिरी दिन’; ‘पुनर्वास’, ‘आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू’, ‘असबाब-ए-वीरानी’ (उपन्यास); ‘मुहल्ले का रावण’, ‘मानपत्र’, ‘थिएटर’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘एक लम्बी छाँह’ (यात्रा-संस्मरण); ‘छायावाद की प्रासंगिकता’, ‘समानान्तर’, ‘वागर्थ’, ‘भूलने के विरुद्ध’, ‘अज्ञेय: वागर्थ का वैभव’, ‘अज्ञेय का कवि कर्म’, ‘आलोचना का पक्ष’, दो साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ जयशंकर प्रसाद तथा अज्ञेय पर (समालोचना); ‘मेरे साक्षात्कार’ (साक्षात्कार); काव्यानुवादों की चार पुस्तिकाएँ ‘तनाव’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत प्रकाशित। ‘राशोमन’ नाटक का अनुवाद ‘मटियाबुर्ज’ नाम से (अनुवाद)। सम्पादन: प्रसाद रचना-संचयन तथा अज्ञेय काव्य-स्तबक (साहित्य अकादेमी), निराला-संचयन (महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए)। पता: एम-4, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल (म.प्र.)।

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