KASTURBA KAMLA PRABHAWATI

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-066-2

Author:ASHA PRASAD

Pages:268

MRP:Rs.295/-

Stock:In Stock

Rs.295/-

Details

आमतौर पर हमारा ध्यान राजनीतिक क्षेत्र के महान नेताओं की ओर जाता है, लेकिन उनकी पत्नियों के बारे में शायद ही कोई सोचता हो। लेकिन कस्तूरबा, कमला नेहरू एवं प्रभावती देवी ऐसी विशिष्ट महिलायें थी, जिन्होंने महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू एवं जयप्रकाश नारायण की तरह महान हस्तियों के साये में रहते हुए और पत्नी के रूप में उनके साथ पूरा सहयोग करते हुए भी अपना एक अलग व्यक्तित्व बनाया और राष्ट्रीय जीवन में अपने बहुमूल्य योगदान के चलते हमारे राष्ट्रीय एवं समाज-सुधार आन्दोलन के इतिहास में अपने लिए एक गौरवपूर्ण स्थान के योग्य बनीं। यह भी एक विचित्र संयोग रहा कि तीनों के जीवन में काफी समानता थी और राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्नों पर तीनों के दृष्टिकोण समान थे। उनके आपस के सम्बन्ध भी अत्यन्त मधुर थे। कस्तूरबा के लिये कमला और प्रभावती दोनों पुत्रियों के समान थी, यह कहना गलत नहीं होगा कि कमला के लिए प्रभावती पर भी लागू है। इस पुस्तक के दिये उनके बीच हुए पत्रचार से इस मैत्री की अच्छी झलक पाठकों को मिलेगी। कमला पर एकाध पुस्तकें निकली अवश्य हैं, लेकिन इस मैत्री की चर्चा वहाँ बिल्कुल नहीं है। यह पुस्तक इन्हीं कमियों को दूर करने के लिए प्रकाशित की जा रही है।

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ASHA PRASAD

ASHA PRASAD आशा प्रसाद (1929-2001) का जन्म एवं लालन-पालन बिहार के एक संभ्रान्त परिवार में हुआ । उच्च शिक्षा प्राप्त करने में काफी उनकी रुचि प्रारम्भ से ही थी । 1954 में उन्होनें पटना विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। उसके बाद अमेरिका जाकर उन्होनें शिक्षा के क्षेत्र में अध्ययन किया और 1957 में कोलम्बिया विश्वविद्यालय (न्यूयार्क) से इसमें भी एम.ए. की डिग्री प्राप्त की । वहाँ से लौटने के बाद उन्होने पाँच वर्ष तक पटना के मगध महिला कॉलेज में प्राध्यापक का काम किया । पटना से जब वे अपने पति के साथ दिल्ली आईं तब कई साल तक पति और तीन बच्चों की देखभाल ही उनका मुख्य काम हो गया । लेकिन जब बच्चे जब बड़े हो गये तब उन्होनें लेखन की तरफ ध्यान दिया । 1973 में उनकी स्वामी विवेकानन्द की वृहत जीवनी प्रकाशित हुई, जिसका काफी स्वागत हुआ । हाल में, सन 2000 में, इसका अजिल्द प्रकाशन हुआ जिससे यह पुस्तक अधिक लोगों के पास पहुँच सके । इस पुस्तक के बाद वे समय-समय पर धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिन्दुस्तान में स्वामी विवेकानन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, जयप्रकाश नारायण एवं प्रभावती पर लेख लिखतीं रही ।नेताजी की जीवनी भी वे साथ-साथ लिख रही थीं, लेकिन लेकिन वह पूरी न हो सकी कि वे चल बसी इस पुस्तक में चर्चित महिलाओं के प्रति उनका आकर्षण धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि नेताजी वाली पुस्तक को अधूरा छोड़कर वे इनके बारे मेंलिखने में लग गईं और अपने अन्तिम समय तक इसी में लगी रहीं ।

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