BATON-MULAKATON MEIN SHAHRYAAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-262-6

Author:PREM KUMAR

Pages:264

MRP:Rs.395/-

Stock:In Stock

Rs.395/-

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बातों.मुलाकातों में शहरयार

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शहरयार जैसे शायर की अस्वस्थता के दिनों में। उनके साथ-पास होने, उनसे बातचीत करने के हर अवसर पर लगा कि उनकी ज़िन्दगी आर शायरी में। का बहुत कुछ अज्ञात-ज्ञातव्य इस दौर में जानने को मिल रहा है। हर क़दम पर लगा कि पहले के शहरयार से हुई बातें उनके एक अलग व्यक्तित्व और उनकी निज की कुछ परिचित-सी विशेषताओं से अवगत कराती हैं- तो बाद के शहरयार से हुई। बातें-मुलाकातें उनकी रचनाओं- रचनात्मकता को साथ उनकी हिम्मत, क्षमता, जिजीविषा, रोग-शोक-संकट से चुप-चुप लड़ते रहकर प्रसन्न-अप्रभावित रह सकने की अद्भुत सामर्थ्य और मानसिकता से परिचित कराती हैं। इस सब को व्यवस्थित करने के क्रम में ऐसा भी। लगा कि यह प्रयास सिर्फ़ कुछ सवालों का पूछ लेना। भर नहीं था-या इन जवाबों को पा लेना किन्हीं। सुचिन्तित- सुविचारित, आयोजित-प्रायोजित उत्तरों को प्राप्त कर लेना भर नहीं था। उससे कहीं अधिक और आगे यह प्रयास एक रचनाकार-शायर की। स्मृतियों की मंजूषा में से उसकी सविधा, रुचि और कोशिश के बल पर उसमें के मूल्यवान-उपयोगी को देख-जान-पा लेना था। इसे यू भी कह सकते हैं कि यह प्रयास एक शायर-शहयार के पूरे एक युग के इतिहास के अनगिन-अनजाने हिस्सों को। देख-पा-जान लेने जैसा था। और जब यह सब इस रूप में तैयार हो गया तो यूँ भी लगा कि यह प्रयास किसी सर्जक से उसके मन, उसकी इच्छा से उसी की ज़बानी उसके अन्तस में सहेज-संभालकर रखे हए कछ अनुभवों-दृश्यों- किस्सों को अफ़सानों की तरह। कहलवा लेना या उन्हें औपन्यासिक रूप और। विस्तार दिला लेना था।

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