PADUMLAL PUNNALAL BAKSHI GRANTHAWALI (8VOL SET)

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-517-6

Author:ED. NALINI SRIVASTAV

Pages:


MRP : Rs. 6000/-

Stock:In Stock

Rs. 6000/-

Details

हिन्दी साहित्य का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन किया गया। धीरे-धीरे यही पत्रिका हिन्दी साहित्य की मेरुदंड बनी । आखिर वह क्या रहस्य था कि छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव खैरागढ़ में 27 मई 1894 को जन्म लेकर 'साहित्यवाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी' ने हिन्दी साहित्याकाश में एक ज्योतिर्मय अलौकिक नक्षत्र का स्थान ग्रहण किया । बख्शी जी की ज्ञान जिज्ञासा, अदम्य लालसा और साहित्यिक अभिरुचि ने उन्हें साहित्य जगत का कीर्ति स्तम्भ बनाया है । सन 1900 में देवकीनन्दन खत्री के 'चन्द्रकान्ता' और 'चन्द्रकान्ता संतति' से परिचित होकर साहित्य जगत में डुबकी लगाने के लिए व्याकुल हो गये थे। यही व्याकुलता उन्हें साहित्य जगत में विचरण करने के लिए प्रेरित करती रही । जीवन भर बख्शी जी कथा-साहित्य का मन्थन कर रसिकों को अमृतमयी साहित्य का मर्म समझाते रहे । असीम आनन्द की प्राप्ति ही प्रत्येक मनुष्य की अदम्य लालसा होती है । हमें यह ज्ञान होना चाहिए कि आनन्द की भावना हमारे मन में ही समायी रहती है । उसे खोजने के लिए हमें कहीं नहीं जाना पड़ता है । हमारी बुद्धि की सक्रियता आनन्द की सोच ही हमारे अन्तर्मन में एक अलौकिक मस्ती का भाव ला देती है । बख्शी एक सफल सम्पादक, भावुक कवि, कुशल कहानीकार, स्वस्थ आलोचक व समीक्षक, वैयक्तिक निबन्धकार, मौलिक चिन्तक और आदर्श शिक्षक थे । बख्शी को समझना इतना आसान भी नहीं है, लेकिन हमने उस धरोहर को एक पुस्तक की शक्ल में प्रस्तुत किया है ।

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