BARF KA GOLA

Original Book/Language: बर्फ़ का गोला

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-502-3

Author:BAPSI SIDHWA

Translation:इधर लाहौर में खंडहर हो रहे मुग़ल दरवाज़ों के पीछे पुराना शहर जल रहा था, उधर तीस किलोमीटर दूर अमृतसर भी आग के हवाले था। किसी का ध्यान नहीं गया कि इस जलते शहर में मासूम राणा भी घूम रहा है। किसी को कोई परवाह नहीं थी। उसकी ही तरह न जाने कितने मैले-कुचैले, भूखे-प्यासे बच्चे, लुटे हुए घरों, जली हुई इमारतों के मलबे में कुछ तलाशते घूम रहे थे। सिर के गहरे घाव में कपड़ा लगाए, दर्द को भूल चुका राणा गली-गली भटकता रहा। जले हुए घरों में, खाली पड़े घरों में लाशों के बीच कहीं रोटी या अपने काम की कोई चीज़ तलाशता रहा। जो मिला, वह खा लिया। कच्चे आलू, बिना पका अनाज, सड़ी हुई सब्जियाँ, सब्जियों के छिलके। किसी को परवाह नहीं थी कि इस अधनंगे बच्चे को क्या-क्या देखना पड़ रहा है। उसने खाली पड़े सुनसान मकानों के दरवाजों से झाँककर देखा। चारों तरफ भुतहा सन्नाटा। एक मकान में रोते हुए बच्चों और जवान औरतों के साथ सिर पर हाथ धरे किसान बैठे थे। उसने एक नंगी औरत देखी, उसकी गोरी कश्मीरी चमड़ी पर जगह-जगह नीले निशान पड़े हुए थे, जगह-जगह चाकू या दरांती की चोट के निशान भी थे। उसका सिर छत के पंखे से लटक रहा था। बाल सुलभ जिज्ञासा से उसने ऊपर देखा उस औरत के बाल जला दिए गए थे। उसने माँ की गोद से छीनकर दीवारों से पटककर मार दिए गए बच्चे देखे, उनकी रोती-बिलखती माँओं के साथ जानवरों की तरह बलात्कार होते और फिर उनकी हत्याओं के नज़ारे देखे।

Pages:280


MRP : Rs. 325/-

Stock:

Rs. 325/-

Details

बर्फ़ का गोला

Additional Information

इधर लाहौर में खंडहर हो रहे मुग़ल दरवाज़ों के पीछे पुराना शहर जल रहा था, उधर तीस किलोमीटर दूर अमृतसर भी आग के हवाले था। किसी का ध्यान नहीं गया कि इस जलते शहर में मासूम राणा भी घूम रहा है। किसी को कोई परवाह नहीं थी। उसकी ही तरह न जाने कितने मैले-कुचैले, भूखे-प्यासे बच्चे, लुटे हुए घरों, जली हुई इमारतों के मलबे में कुछ तलाशते घूम रहे थे। सिर के गहरे घाव में कपड़ा लगाए, दर्द को भूल चुका राणा गली-गली भटकता रहा। जले हुए घरों में, खाली पड़े घरों में लाशों के बीच कहीं रोटी या अपने काम की कोई चीज़ तलाशता रहा। जो मिला, वह खा लिया। कच्चे आलू, बिना पका अनाज, सड़ी हुई सब्जियाँ, सब्जियों के छिलके। किसी को परवाह नहीं थी कि इस अधनंगे बच्चे को क्या-क्या देखना पड़ रहा है। उसने खाली पड़े सुनसान मकानों के दरवाजों से झाँककर देखा। चारों तरफ भुतहा सन्नाटा। एक मकान में रोते हुए बच्चों और जवान औरतों के साथ सिर पर हाथ धरे किसान बैठे थे। उसने एक नंगी औरत देखी, उसकी गोरी कश्मीरी चमड़ी पर जगह-जगह नीले निशान पड़े हुए थे, जगह-जगह चाकू या दरांती की चोट के निशान भी थे। उसका सिर छत के पंखे से लटक रहा था। बाल सुलभ जिज्ञासा से उसने ऊपर देखा उस औरत के बाल जला दिए गए थे। उसने माँ की गोद से छीनकर दीवारों से पटककर मार दिए गए बच्चे देखे, उनकी रोती-बिलखती माँओं के साथ जानवरों की तरह बलात्कार होते और फिर उनकी हत्याओं के नज़ारे देखे।

About the writer

BAPSI SIDHWA

BAPSI SIDHWA

Books by BAPSI SIDHWA

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality