Apne Apne Pinjare (2 Volume Set)

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8843-409-6

Author:MOHANDAS NAIMISHRAI

Pages:160


MRP : Rs. 790/-

Stock:In Stock

Rs. 790/-

Details

अपने-अपने पिंजरे (खण्ड-2)

Additional Information

खण्ड - 1 मेरे जीवन में एक ऐसी घटना हो गयी जिसने मुझे लड़के से पुरुष बना दिया। यूँ उसे दुर्घटना भी कहा जा सकता था। महानगरीय भोग और संभोग की चरम संस्कृति का यह मेरा पहला अनुभव था। न जाने कैसे यह सब हो गया था। उस समय सपने जैसा लगा था। अपने अकेलेपन को एक रात उसने मेरे साथ बाँटा था। हालाँकि वह उम्र में मुझसे दोगुनी थी। पर उसकी देह अब भी भरी-पूरी थी। गोरे रंग की चौड़े माथेवाली औरत थी वह, पर मेरा शरीर पाने और झिंझोड़ने का न उसके भीतर उन्माद था और न आक्रोश, बल्कि वह तो स्वयं पिघलने वाली औरतों में से थी, जो अपनी उदास और तनहा रात में भले ही चन्द पलों के लिए किसी मर्द की बाँहों में खो जाना चाहती थी। पर न तो मेरी भुजाएँ भीष्म जैसी थीं और न ही मेरी छाती पर काले बाल तक उगे थे। मैं वैसा मर्द तो न था। मैं तो उसके लिए बस नर्म गोश्त का टुकड़ा भर था। उस रात उसने मुझे मर्द बना दिया था। एक मर्द को ऐसे समय क्या करना चाहिए, यह भी सिखला दिया था। / खण्ड – 2 सच्चाइयों को सम्मुख रखा जिसे इस देश का साहित्यिक मानस स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इस शती के सातवें-आठवें दशक में मराठी साहित्य में उभरे दलित स्वर ने इस देश के साहित्य-मानस को बुरी तरह झकझोरा था और व्यथित भी किया था। उसमें न तो वह अभिजात था जिसकी हमारे मानस को आदत थी और न वह आडम्बर था जिसे हम बड़े स्नेह से यत्नपूर्वक सहेजते चले आ रहे थे। मराठी में दलित लेखकों द्वारा लिखे गये आत्म-वृत्त इस दृष्टि से बहुचर्चित हैं और महत्त्वपूर्ण भी। मराठी आलोचक इन रचनाओं को आत्मकथा या आत्मचरित्र कहने की बजाये 'आत्मवृत्त' कहना अधिक उचित समझते हैं, क्योंकि उनके कथनानुसार, आत्मकथाएँ अवकाश ग्रहण के उपरान्त बुढ़ापे में लिखी जाती हैं। वे स्वकेन्द्रित होती हैं। उनमें वर्णित प्रसंग कब के हो चुके होने से 'भूतकालीन' होते हैं, 'वर्तमान' से उनका कोई सरोकार नहीं होता। आत्मवृत्त युवा लेखकों द्वारा लिखे गये हैं, जिन्होंने अपने वृत्तों के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया है कि आखिर हम कौन हैं, जिस रूप में आज हम समाज में पहचाने जाते हैं उसका कारण क्या है। ऐसे लेखक पीछे मुड़कर इसलिए देखते हैं कि सामने का रास्ता साफ और स्पष्ट दिखाई दे। मोहनदास नैमिशराय की यह कृति इस अर्थ में आत्मकथा न होकर आत्मवृत्त है। उन्होंने अपने जीवन की उन तल्ख और निर्मम सच्चाइयों को इसमें उकेरा है जिनमें मानवीय पीड़ा अपनी पूरी सघनता से व्यक्त हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण व्यक्ति के ऊपर सड़ी-गली व्यवस्था का वह आरोपण है जिसके प्रति वह विवश होकर सब कुछ सहते जाने के लिए अभिशप्त रहा है। यह बहुत अच्छी बात है कि जिस दलित मानसिकता की अभिव्यक्ति दो-तीन दशक पहले मराठी साहित्य में दिखायी शुरू हुई थी जिसने और वहाँ एक नये सौन्दर्यशास्त्र की रचना की, वह अब हिन्दी में भी मुखर हो रही है और मोहनदास नैमिशराय जैसे समर्थ लेखक पूरी संलग्नता और प्रतिबद्धता से उसे रूप और आकार दे रहे हैं। -महीप सिंह

About the writer

MOHANDAS NAIMISHRAI

MOHANDAS NAIMISHRAI मोहनदास नैमिशराय एक ऐसी शख़्सियत हैं, जो बचपन से ही जीवन के यथार्थ से रू-ब-रू हो गये थे। जिन्होंने बचपन में तथागत बुद्ध को याद करते हुए 'बुद्ध वन्दना' में शामिल होना शुरू कर दिया था। उनके दर्शन से जुड़े। इसलिए कि डॉ. अम्बेडकर का मेरठ में हुआ भाषण उनकी स्मृति में था। जैसा उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘अपने-अपने पिंजरे' में लिखा है-6 दिसम्बर, 1956 को जब बाबा साहेब का परिनिर्वाण हुआ, जब उनकी बस्ती में कोई चूल्हा नहीं जला था। उदास चूल्हे, उदास घर और उसी उदासी के परिवेश की गिरफ्त में दलित। नैमिशराय जी के लेखकीय खाते में दो कविता संग्रह के साथ पाँच कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास से इतर दलित आन्दोलन पत्रकारिता से इतर अन्य विषयों पर 50 पुस्तकें दर्ज हुई हैं। उन्होंने अंग्रेज़ी तथा मराठी से अनुवाद भी किये। वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (राष्ट्रपति निवास), शिमला में फेलो भी रहे। साथ ही डॉ. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नयी दिल्ली में मुख्य सम्पादक के रूप में उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी निभायी।

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