KAMRED KA BAKSA

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-612-9

Author:SURAJ BADATIYA

Pages:104


MRP : Rs. 200/-

Stock:In Stock

Rs. 200/-

Details

‘कामरेड का बक्सा’ शीर्षक इस कहानी संग्रह में कुल जमा पाँच कहानियाँ हैं - ‘फीलगुड’, ‘गुज्जी’, ‘गुफाएँ’, ‘कामरेड का बक्सा’ और ‘कबीरन’। वैसे तो केवल पाँच कहानियों के आधार पर किसी लेखक के बारे में एक निर्णयात्मक स्थिति तक पहुँचना जोखिम भरा काम है फिर भी इन कहानियों से गुजरते हुए यह सुखद अहसास जरूर होता है कि सूरज बड़त्या में भविष्य का एक सार्थक एवं बड़ा कहानीकार होने की अनन्त सम्भावनाएँ हैं। इन कहानियों में किस्सागोई की शैली और कहन की विशिष्टता ने पठनीयता के गुण को इस प्रकार से निखारा है कि कहानी को एक साँस में चट कर जाने की उत्सुकता पैदा होती है। दलित समझ से लिखी गयी इन कहानियों में विमर्श सतह पर उतरता नहीं दिखाई देता बल्कि यही कि विचारधारा दृष्टि का उन्मेष करती है। कहानीकार की इस संक्षिप्त कहानी-यात्रा में विकास-प्रक्रिया का संकेत मिलता है जो उत्तरोत्तर निखरती गयी है। संग्रह की अन्तिम कहानी ‘फीलगुड’ सम्भवतः लेखक की भी पहली कहानी है जो जाति छिपाने की हीन-ग्रन्थि को केन्द्र में रखकर लिखी गयी है। घृणा की सीमा तक फैली हुई अस्पृश्यता की समस्या दलित समुदाय की सबसे अपमानजनक समस्या है जिसका सामना पढ़े-लिखे दलितों को कदम-कदम पर करना पड़ता है। ‘सरनेम’ जानने की सवर्ण जिज्ञासा ही जाति छिपाने की प्रेरणा देती है। ‘गुज्जी’ कहानी में गुज्जी के ब्योरेवार वर्णन में नये दलित बिम्बों एवं प्रतीकों का प्रयोग कहानी की सृजनात्मकता में बाधक नहीं है। ऐसे दृश्य अभिजन साहित्य में भले वर्जित रहे हों पर ‘सूअर भात’ देने के विरले अवसर तो दलित समाज के जीवनोत्सव हुआ करते थे। यहीं अभिजन साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र से दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र का अन्तर भी स्पष्ट हो जाता है। अन्य तीनों कहानियाँ अपनी बनावट और बुनावट की दृष्टि से बेहतर कहानियाँ हैं जिनमें ‘कामरेड का बक्सा’ को ‘कामरेड का कोट’ और ‘लाल किले के बाज’ के साथ रखकर भी पढ़ा जा सकता है। पर इसकी विशिष्टता यह है कि इसमें ‘मार्क्स’ और अम्बेडकर के विचारों के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को विरोध और सामंजस्य की युगपत प्रक्रिया में रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। वर्ण बनाम वर्ग के अन्तर्विरोध के बावजूद ‘अपने लोगों के लिए’ बेचैनी दोनों को व्यथित करती है। ‘गुफाएँ’ कहानी दलित समुदाय के अपने अन्तर्विरोधों और उपजातियों की आन्तरिक समस्याओं से जूझती कहानी है। अन्तर्विरोधों से मुक्त होने की छटपटाहट और लेखक की बेचैनी को साफ देखा जा सकता है। ‘कबीरन’ कहानी अद्भुत लेकिन दलित साहित्य को नया आयाम देती हुई उसके फलक को व्यापक करती है। इसमें हिजडे़ समुदाय के दर्द और उनके साथ होते सामाजिक अन्याय के घने और गहरे बिम्ब हैं। निश्चित तौर पर सूरज बड़त्या ने एक युवा कहानीकार के रूप में अपनी अलग पहचान बना ली है, इसमें सन्देह नहीं।

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About the writer

SURAJ BADATIYA

SURAJ BADATIYA दस्तावेजी तिथि के अनुसार सूरज बड़त्या का जन्म 15 जनवरी 1974 को हुआ। सूरज बड़त्या की शिक्षा - बी.ए. इतिहास (दिल्ली विश्वविद्यालय), एम.ए. हिन्दी (स्वर्ण-पदक) दिल्ली विश्वविद्यालय, एम.फिल. (हरिशंकर परसाई के व्यंग्य निबन्धों की आलोचना), पीएच.डी. (सत्ता संस्कृति का वर्चस्ववादी विमर्श और दलित चेतना) दिल्ली विश्वविद्यालय से, पत्रकारिता में डिप्लोमा (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय)। इनका अध्यापन - दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविन्दो कॉलेज, पत्राचार पाठ्यक्रम, नॉन कालिजिस्ट, वेंकटेश्वरा कॉलेज। सूरज बड़त्या के सन् 1997 से कविता लेखन, राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में समीक्षा, लेख प्रकाशित हुए हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, रिसर्च पेपर, पुस्तक समीक्षाएँ इत्यादि प्रकाशित हुई हैं। इग्नू के एम.ए. दलित साहित्य के लिए पाठ्यक्रम नोट्स लेखन। कविताएँ अनूदित अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों में प्रकाशित हुई हैं। कृतित्व - दलित साहित्य पक्ष-प्रतिपक्ष, दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, बाबू मंगूराम और आदि धर्म आन्दोलन। इनकी सम्पादित पुस्तकें हैं - भारतीय दलित साहित्य का विद्रोही स्वर (विमल थोरात-सूरज बड़त्या), प्रभुत्व एवं प्रतिरोध, भारतीय दलित कहानियाँ (विमल थोरात-सूरज बड़त्या), कविता संग्रह (प्रकाशनाधीन)। सूरज बड़त्या ने ‘संघर्ष’ त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया है, ‘युद्धरत आम आदमी’ त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया है। ‘दलित अस्मिता’ त्रैमासिक पत्रिका में फिलहाल सहायक सम्पादक हैं। मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, 1999; लोकसूर्या साहित्य सम्मान (महाराष्ट्र), 2009; वाणी विचार मंच, साहित्य सम्मान (पंजाब), 2009 से सम्मानित किये गये हैं। वर्तमान समय में दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड यूनिवर्सिटी) में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हैं।

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