PAANCH BEHATREEN KAHANIYAN

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-329-6

Author:RABINDRANATH TAGORE

Pages:102

MRP:Rs.75/-

Stock:In Stock

Rs.75/-

Details

"दुनिया में जन्म लेकर जिस लड़के को बचपन में ही गुम-सुम भला आदमी बनना पड़े, कभी-कभी एकदम सोच-विचार को छोड़ कर आजादी जिसकी किस्मत में न जुटे, खुश होकर शरारत दिखाना या दुख पाकर रोना, इन दोनों को ही जिसे दूसरे लोगों की असुविधा और नाराजगी के डर से उस छोटी उम्र में ही सोच-सोचकर दबाकर रखना पड़े, उसके समान दया का पात्र, फिर भी दया पाने में असफल दुनिया में और कौन है!"

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RABINDRANATH TAGORE

RABINDRANATH TAGORE रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कलकत्ता में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उनके पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर एक जाने-माने समाज सुधारक थे। वे चाहते थे कि रवीन्द्रनाथ बड़े होकर बैरिस्टर बनें। उन्होंने रवीन्द्रनाथ को कानून की पढ़ाई के लिए 1878 में लन्दन भेजा लेकिन रवीन्द्रनाथ का मन तो साहित्य में था, फिर मन वहाँ कैसे लगता। कुछ समय तक लन्दन के कॉलेज विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री लिये वापस आ गये। रवीन्द्रनाथ टैगोर की बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबन्धकार और चित्रकार के रूप में विश्व प्रसिद्धि है। भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ रूप से पश्चिमी देशों का परिचय और पश्चिमी देशों की संस्कृति से भारत का परिचय कराने में टैगोर की बड़ी भूमिका रही तथा आमतौर पर उन्हें आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में सूजन किया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की सबसे लोकप्रिय रचना 'गीतांजलि' रही जिसके लिए 1913 में उन्हें नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। वे विश्व के एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्र-गान बनीं। भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बांग्लादेश का राष्ट्र गान 'आमार सोनार बांग्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। 'गीतांजलि' का अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है। टैगोर का नाम दुनिया के कोने-कोने में फैल गया और वे विश्व-मंच पर स्थापित हो गये। रवीन्द्रनाथ की कहानियों में 'काबुलीवाला', 'मास्टर साहब' और 'पोस्टमास्टर' आज भी लोकप्रिय कहानियाँ हैं। गुरुदेव की रचनाओं में स्वतन्त्रता आन्दोलन और उस समय के समाज की झलक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस साहित्यकार का 7 अगस्त, 1941 को कलकत्ता में निधन।

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