JUNGAL MEIN AAG

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-583-2

Author:ED. RAMESH CHANDRA SHAH

Pages:148


MRP : Rs. 250/-

Stock:Out of Stock

Rs. 250/-

Details

जंगल में आग

Additional Information

रमेशचन्द्र शाह हिन्दी के उन कम लेखकों में हैं जो अपने 'हिन्दुस्तानी अनुभव' को अनेक कोणों से देखने-परखने की कोशिश करते हैं और चूँकि यह अनुभव स्वयं में बहुत पेचीदा, बहुमुखी और संश्लिष्ट है, शाह उसे अभिव्यक्त करने के लिए हर विधा को टोहते-टटोलते हैं- एक अपूर्व जिज्ञासा और बेचैनी के साथ। आज हम जिस भारतीय संस्कृति की चर्चा करते हैं, शाह की कहानियाँ उस संस्कृति के संकट को हिन्दुस्तानी मनुष्य के औसत, अनर्गल और दैनिक अनुभवों के बीच तार-तार होती हुई आत्मा में छानती हैं। इन कहानियों का सत्य दुनिया से लड़कर नहीं, अपने से लड़ने की प्रक्रिया में दर्शित होता है : एक मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी का हास्यपूर्ण, पीडायुक्त विलापी क़िस्म का एकालाप, जिसमें वह अपने समाज, दुनिया, ईश्वर और मुख्यतः अपने 'मैं' से बहत करता चलता है। शाह ने अपनी कई कहानियों में एक थके-हारे मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी की 'बातूनी आत्मा' को गहन अन्तर्मुखी स्तर पर व्यक्त किया है : उस डाकिए की तरह जो मन के संदेशे आत्मा को, आत्मा की तक़लीफ़ देह को और देह की छटपटाहट मस्तिष्क को पहुँचाता रहता है। इन सबको बाँधने वाला तार उनकी शैली के अद्भुत 'विट' में झनझनाता है-भाषा के साथ एक अत्यन्त सजग, चुटीला और अन्तरंग खिलवाड़, जिसमें वे गुप्त खिड़की से अपने कवि को भी आने देते हैं। पढ़कर जो चीज याद रह जाती है, वे घटनाएँ नहीं, कहानी के नाटकीय प्रसंगों का तानाबाना भी नहीं, परम्परागत अर्थ में कहानी का कथ्य भी नहीं, किन्तु याद रह जाती है एक हड़बड़ाए भारतीय बुद्धिजीवी की भूखी, सर्वहारा, छटपटाहट, जिसमें कुछ सच है, कुछ केवल आत्मपीड़ा, लेकिन दिल को बहलाने वाली झूठी तसल्ली कहीं भी नहीं।

About the writer

ED. RAMESH CHANDRA SHAH

ED. RAMESH CHANDRA SHAH रमेशचन्द्र शाह का जन्म (1937) अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में हुआ। आरम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एससी. तथा आगरा से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1997 में भोपाल के हमीदिया महाविद्यालय से अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भोपाल स्थित ‘निराला सृजनपीठ’ के निदेशक रहे (दिसम्बर, सन् 2000 तक)। उपन्यास ‘पूर्वापर’ को भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता ने, ‘गोबरगणेश’ तथा काव्यकृति ‘नदी भागती आई’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने, आलोचना-पुस्तक ‘छायावाद की प्रासंगिकता’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् ने पुरस्कृत किया। उपन्यास ‘किस्सा गुलाम’ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। निबन्ध-संग्रह ‘स्वधर्म और कालगति’ को मध्यप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार प्रदान किया गया। श्री शाह को सन् 1987-88 में मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा ‘शिखर-सम्मान’ से सन् 2001 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा ‘व्यास-सम्मान’ से तथा सन् 2004 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया जा चुका है। प्रकाशित कृतित्व: ‘रचना के बदले’, ‘शैतान के बहाने’, ‘आडई़ का पेड़’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ (निबन्ध-संग्रह); ‘कछुए की पीठ पर’, ‘हरिश्चन्द्र आओ’, ‘नदी भागती आई’, ‘प्यारे मुचकुन्द को’, ‘देखते हैं शब्द भी अपना समय’, चुनी हुई कविताओं का संकलन ‘चाक पर’ वाग्देवी प्रकाशन पॉकेट बुक संस्करण में उपलभ्य, तीन बाल कविता-संग्रह तथा दो बाल-नाटक भी (कविता-संग्रह); ‘गोबरगणेश’, ‘किस्सा गुलाम’, ‘पूर्वापर’, ‘आखिरी दिन’; ‘पुनर्वास’, ‘आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू’, ‘असबाब-ए-वीरानी’ (उपन्यास); ‘मुहल्ले का रावण’, ‘मानपत्र’, ‘थिएटर’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘एक लम्बी छाँह’ (यात्रा-संस्मरण); ‘छायावाद की प्रासंगिकता’, ‘समानान्तर’, ‘वागर्थ’, ‘भूलने के विरुद्ध’, ‘अज्ञेय: वागर्थ का वैभव’, ‘अज्ञेय का कवि कर्म’, ‘आलोचना का पक्ष’, दो साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ जयशंकर प्रसाद तथा अज्ञेय पर (समालोचना); ‘मेरे साक्षात्कार’ (साक्षात्कार); काव्यानुवादों की चार पुस्तिकाएँ ‘तनाव’ पुस्तकमाला के अन्तर्गत प्रकाशित। ‘राशोमन’ नाटक का अनुवाद ‘मटियाबुर्ज’ नाम से (अनुवाद)। सम्पादन: प्रसाद रचना-संचयन तथा अज्ञेय काव्य-स्तबक (साहित्य अकादेमी), निराला-संचयन (महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के लिए)। पता: एम-4, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल (म.प्र.)।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality