SERAJ BAND BAJA

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-361-6

Author:JAINANDAN

Pages:186


MRP : Rs. 200/-

Stock:Out of Stock

Rs. 200/-

Details

कथाकार जयनंदन आज की आयातित और जबरन थोपी गयी जटिल नव उपभोक्तावादी संस्कृति के जाल में घिरे हुए आम आदमी के जीवन में उभरी आकस्मिक उथल-पुथल और उनकी चिन्ताओं का भावात्मक एवं संवेदनशील रूपक गढ़ते हुए मार्मिक, हृदयस्पर्शी एवं तार्किक भाषायी शब्द-रंगों से कथानक के जरिये गोया पेंटिंग करते हैं। ऐसी पेंटिंग जो अपनी तरफ खींच ले, मुग्ध कर दे और अपनी अभिव्यक्ति से कायल बना दे। जयनंदन एक समर्थ कहानीकार के तौर पर पिछले बत्तीस वर्षों से कथा जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। इनके रचना-संसार का फलक जितना व्यापक है, वैसा हिन्दी में कम ही लेखकों में दिखता है। बाजारवाद के संक्रमण और सामाजिक जीवन-मूल्यों के विचलन से सम्बन्धित कहानियों पर जब भी चर्चा होती है, तो उसमें जयनंदन अनिवार्य रूप से उद्धृत होते हैं। इस संग्रह की कहानियों में वे अनेक सामाजिक अन्तर्विरोधों, विडम्बनाओं और त्रासदियों की पड़ताल करते हैं। कहानी ‘प्रोटोकॉल’ में वे कहते हैं कि इज़्ज़त-आबरू और संस्कृति का लिब्रेलाइज़ेशन नहीं होता...विदेशी मुद्रा से बड़ी हैं ये चीजें। ‘घर फूँक तमाशा’ कहानी में पुत्र के इस सवाल पर कि ‘कारखाने बन्द क्यों हो रहे हैं और रुपया का मूल्य रोज़-ब-रोज़ घटता क्यों जा रहा है?’, पिता कहता है कि ‘इसका जवाब अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और अमेरिका के सिवा इस देश में किसी के पास नहीं है।’ इस तरह जयनंदन हिन्दी साहित्य में जो लीक बनाते दिख रहे है वे बहुत लम्बी, गहरी और स्थायी होती जान पड़ रही है।

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About the writer

JAINANDAN

JAINANDAN जयनंदन का जन्म 26 फरवरी, 1956 नवादा (बिहार) के मिलकी गाँव में हुआ। इन्होंने एम.ए. (हिन्दी) की शिक्षा प्राप्त की। इनकी अब तक कुल बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘श्रम एव जयते’, ‘ऐसी नगरिया में केहि विधि रहना’, ‘सल्तनत को सुनो गाँववालो’ (उपन्यास); ‘सन्नाटा भंग’, ‘विश्व बाजार का ऊँट’, ‘एक अकेले गान्ही जी’, ‘कस्तूरी पहचानो वत्स’, ‘दाल नहीं गलेगी अब’, ‘घर फूँक तमाशा’, ‘सूखते स्रोत’, ‘गुहार’, ‘गाँव की सिसकियाँ’, ‘भितरघात’, ‘मेरी प्रिय कथायें’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ (सभी कहानी संग्रह); ‘नेपथ्य का मदारी’, ‘हमला’ तथा ‘हुक्मउदूली’ (तीनों नाटक); ‘मन्थन के चौराहे’ (वैचारिक लेखों का संग्रह) तथा ‘राष्ट्रनिर्माण के तीन टाटा सपूत’ (टाटाओं की जीवनी)। जयनंदन की देश की प्रायः सभी श्रेष्ठ और चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में लगभग सवा सौ कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ कहानियों का फ्रेंच, स्पैनिश, अंग्रेजी, जर्मन, तेलुगु, मलयालम, गुजराती, उर्दू, नेपाली, मराठी, मगही आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है। कुछ कहानियों के टीवी रूपान्तरण टेलीविजन के विभिन्न चैनलों पर प्रसारित हुये हैं। नाटकों का आकाशवाणी से प्रसारण और विभिन्न संस्थाओं द्वारा विभिन्न शहरों में मंचन हुआ है। इनको राधाकृष्ण पुरस्कार, विजय वर्मा कथा सम्मान, बिहार सरकार राजभाषा सम्मान, भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा सर्वश्रेष्ठ चयन के आधार पर युवा लेखक प्रकाशन सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, झारखंड साहित्य सेवी सम्मान, स्वदेश स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया है। वर्तमान समय में जयनंदन टाटा स्टील की गृह पत्रिकाओं का सम्पादन कर रहे हैं।

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