PANKHONWALA KATHGHARA : LEKHIKA KI DIARY

Original Book/Language: पंखोंवाला कठघरा : लेखिका की डायरी

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-511-5

Author:MARGIT SCHREINER

Translation:शायद साहित्य का वास्तविक लक्ष्य है खुल जाना। अपनी स्वयं की वास्तविकता स्थापित करना। शायद जरूरी नहीं कि यह वास्तविकता बेहतर ही हो, पर एक दूसरी हो। जिसमें अन्ततः सब कुछ खुल कर कहा जा सकता हो। शायद यह रहस्य वगैरह एक भारी ग़लतफ़हमी है। साहित्य रहस्यमय हो सकता है, लेकिन वह मनुष्य नहीं, जो उसे लिखता है। बल्कि जिस मनुष्य का कोई रहस्य होता है, वह उसे छुपा कर रखना चाहता है। अगर कोई लेखक अपनी ज़िन्दगी पर लिखता है तो उसके पास छुपाने को बहुत कुछ है। लेकिन जो लेखक छुपाना चाहता है, उसे हमेशा सावधान रहना चाहिए। इस तरह वह एक विषय के प्रति ईमानदारी नहीं बरत सकता। उसे तरकीबें लगानी होंगी, चक्करदार रास्ते खोजने होंगे, चालाकी करनी होगी, मक्कारियाँ करनी होंगी। वह मनुष्यों को सान्त्वना देने या उनका मन बहलाने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा। या तो पाप बोध या दुष्टता, या प्रतिशोध या अज्ञान के कारण। क्योंकि जो स्वयं कोई रहस्य छुपाता है, मिथ्याभिमान या लाभ उठाने के इरादे से, या समझौतावादी प्रवृत्ति के वश, या निम्नमध्यवर्गीय संकोच के कारण, वह अपने वीभत्स रहस्यों को छुपा कर दूसरों को कैसे सान्त्वना देगा? तो ऐसे लेखक के पास और क्या चारा बचता है कि साहित्य को खुला बनाने की बजाय एक ऐसे साहित्य का सृजन करे, जिसमें वह अपने रहस्यों पर पर्दा डाले रहे। लेकिन हर लेखन की सार्थकता हमारे रोज़ बरोज़ के पागलपन में मनुष्यों को सान्त्वना देना है। क्या कहेंगे आप?

Pages:131


MRP : Rs. 250/-

Stock:In Stock

Rs. 250/-

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पंखोंवाला कठघरा : लेखिका की डायरी

Additional Information

शायद साहित्य का वास्तविक लक्ष्य है खुल जाना। अपनी स्वयं की वास्तविकता स्थापित करना। शायद जरूरी नहीं कि यह वास्तविकता बेहतर ही हो, पर एक दूसरी हो। जिसमें अन्ततः सब कुछ खुल कर कहा जा सकता हो। शायद यह रहस्य वगैरह एक भारी ग़लतफ़हमी है। साहित्य रहस्यमय हो सकता है, लेकिन वह मनुष्य नहीं, जो उसे लिखता है। बल्कि जिस मनुष्य का कोई रहस्य होता है, वह उसे छुपा कर रखना चाहता है। अगर कोई लेखक अपनी ज़िन्दगी पर लिखता है तो उसके पास छुपाने को बहुत कुछ है। लेकिन जो लेखक छुपाना चाहता है, उसे हमेशा सावधान रहना चाहिए। इस तरह वह एक विषय के प्रति ईमानदारी नहीं बरत सकता। उसे तरकीबें लगानी होंगी, चक्करदार रास्ते खोजने होंगे, चालाकी करनी होगी, मक्कारियाँ करनी होंगी। वह मनुष्यों को सान्त्वना देने या उनका मन बहलाने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा। या तो पाप बोध या दुष्टता, या प्रतिशोध या अज्ञान के कारण। क्योंकि जो स्वयं कोई रहस्य छुपाता है, मिथ्याभिमान या लाभ उठाने के इरादे से, या समझौतावादी प्रवृत्ति के वश, या निम्नमध्यवर्गीय संकोच के कारण, वह अपने वीभत्स रहस्यों को छुपा कर दूसरों को कैसे सान्त्वना देगा? तो ऐसे लेखक के पास और क्या चारा बचता है कि साहित्य को खुला बनाने की बजाय एक ऐसे साहित्य का सृजन करे, जिसमें वह अपने रहस्यों पर पर्दा डाले रहे। लेकिन हर लेखन की सार्थकता हमारे रोज़ बरोज़ के पागलपन में मनुष्यों को सान्त्वना देना है। क्या कहेंगे आप?

About the writer

MARGIT SCHREINER

MARGIT SCHREINER मार्गिट श्राइनर लिंस में 1953 में जन्म। जालत्सबुर्ग में जर्मनशास्त्र एवं मनोविज्ञान का अध्ययन। 1977 से 3 वर्ष के लिए जापान-प्रवास। इसके बाद जालत्सबुर्ग, पेरिस, बर्लिन तथा इटली में रहते हुए स्वतन्त्र लेखन। अब पुनः लित्स में निवास। कई साहित्य पुरस्कारों में थेओडोर क्योरनर पुरस्कार भी शामिल। पहला उपन्यास 'हॉउस, फ्राउअन, सेक्स' को, जो हिन्दी में 'घर, घरवालियाँ, सेक्स' शीर्षक से प्रकाशित हुआ था, आलोचकों से बहुत प्रशंसा मिली थी, और पाठकों द्वारा काफ़ी सराहा गया था। हिन्दी में इनके दो और उपन्यास 'जीवन एक निराशा' तथा 'मेरा भूतपूर्व पति' भी प्रकाशित हो चुके हैं।

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