GHAR KI BAAT

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-721-8

Author:DR.RAMVILAS SHARMA

Pages:464


MRP : Rs. 995/-

Stock:In Stock

Rs. 995/-

Details

घर की बात

Additional Information

आख़िरकार, एक आम पाठक किसी दूसरे परिवार का इतिहास जानने के लिए क्यों उत्सुक होगा? इसलिए नहीं, कि यह कोई विशेष परिवार है, इसलिए भी नहीं, कि इसने हिन्दी साहित्य को एक अमूल्य रत्न दिया और पाठक, सम्भवतः, जानना चाहेंगे कि इस लेखक को बड़ा बनाने में उसके परिवेश और परिवार ने क्या भूमिका निभाई ? बल्कि इसलिए, कि यह भारत देश में रहने वाला एक आम परिवार है, यानी भारत में रहने वाले तमाम परिवारों की तरह यह परिवार भी कभी गाँव में रहता था। गाँव में पढ़ाई-लिखाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण इन लोगों को गाँव छोड़कर एक छोटे शहर झाँसी में आकर रहना पड़ा। झाँसी में भी उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण इन लोगों को प्रदेश की राजधानी लखनऊ जाना पड़ा और अन्ततः तमाम अन्य परिवारों की तरह ये लोग भी एक महानगर में आकर बस गये। इस मायने में यह कहा जा सकता है कि यह एक ऐसा परिवार है जो भारत की तमाम मध्यवर्गीय जनता का प्रतिनिधित्व करता है। इस परिवार ने भी उन तमाम संघर्षों को झेला है और करीब से देखा है जिन्हें आम जनता रोज देखती और झेलती है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि इन लोगों ने परिवार को जनतांत्रिक तरीके से चलाने की कोशिश की है और इस कोशिश के कुछ दस्तावेजों को बचा कर रखा है ताकि उन्हें आने वाली पीढ़ियों के साथ बाँटा जा सके। बहुत से परिवार आगे चलकर बिखर जाते हैं, लेकिन इन लोगों ने कैसे परिवार के मूल्यों को बचाकर रखा और आगे बढ़ने में एक-दूसरे की मदद की, यह देखने और सीखने की चीज है।

About the writer

DR.RAMVILAS SHARMA

DR.RAMVILAS SHARMA "डॉ॰ रामविलास शर्मा (10 अक्टूबर, 1912- 30 मई, २०००) आधुनिक हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, विचारक एवं कवि थे। व्यवसाय से अंग्रेजी के प्रोफेसर, दिल से हिंदी के प्रकांड पंडित और महान विचारक, ऋग्वेद और मार्क्स के अध्येता, कवि, आलोचक, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, राजनीति-विशारद ये सब विशेषण उन पर समान रूप से लागू होते हैं। उन्नाव जिला के उच्चगाँव सानी में जन्मे डॉ॰ रामविलास शर्मा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. तथा पी-एच.डी. की उपाधि सन् 1938 में प्राप्त की। सन् 1938 से ही आप अध्यापन क्षेत्र में आ गए। 1943 से 1974 तक आपने बलवंत राजपूत कालेज, आगरा में अंग्रेजी विभाग में कार्य किया और अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहे। इसके बाद कुछ समय तक कन्हैयालाल माणिक मुंशी हिन्दी विद्यापीठ, आगरा में निदेशक पद पर रहे। 1970 'निराला की साहित्य साधना' के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार. 1999 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी' के लिये व्यास सम्मान. "

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